Friday, July 26, 2013

मैं तिनके सा

मैंने कहा- मैं तुम्‍हें प्‍यार करता हूं।
उसने कहा- तुम बुद्धू हो।
मैंने कहा- तुम बहुत सुंदर हो।
उसने कहा- -तुम परिपक्‍व नहीं हो।
मैंने कहा- तुम्‍हारे बिना जी नहीं लगता।
उसने कहा-तुम बच्‍चे हो।
मैंने कहा- जिया नहीं जाता अब।
उसने कहा-तुम अधीर हो।
मैंने कहा- तुम्‍हारे सिवा कुछ अच्‍छा नहीं लगता।
उसने कहा-तुम्‍हारा स्‍वार्थ तुम पर हावी हो रहा है।
मैंने कहा- कुछ समझ नहीं आता।
उसने कहा-तुम्‍हारी आंखें बंद हो चुकी हैं।
मैंने कहा- मैं तिनके सा हूं। अपने पांवों में कहीं जगह दे दो।
उसने अपने पावों के पास देखने की बजाय दूर कहीं शोर सुना। वह आगे बढ़ गई। मैं उसके जूते में फंसकर उड़ा और दो कदम दूर झाडि़यों में फंस गया। 

Tuesday, July 2, 2013

दीवारें नहीं टूटीं

उसने कहा- मेरी लड़ाई खुद मुझसे है, तब तक, जब तक मैं सारी स्याहियों को जज्ब करने लायक दामन न
तराश लूं।
कैसी लड़ाई?
किसलिए?
औचित्य क्या है?
-यही तो साफ नहीं है। बस, यह जाहिर है कि लड़ना है। आत्म-परिष्कार के लिए एक युद्ध। शायद उम्र लग जाए। और यह भी हो सकता है कि इसका हासिल मुझे न मिल कर बाकी जमाने को मिले।

आंख खुली तो वह उठ कर बाहर आया। क्षितिज से उजाला फूट रहा था, जैसे चमड़े के कारखाने में से धुआं उठ रहा हो और आसपास की फिजा उसकी कालिख में सन गयी हो। वह बहुत देर तक बॉलकनी पर खड़ा चारों ओर देखता रहा। कहीं कुछ भी नहीं दिखा जिसे देख कर सुकून मिले। तीसरी मंजिल की बॉलकनी से चारों ओर देखते हुए ऐसा लगा कि जैसे वह किसी जंगल में आकर गिरा है और एक उंचे से दरख्त पर अटक गया है। दरख्त में न फूल हैं, न पत्तियां है। सिर्फ शाखें हैं और शाखों पर कांटें हैं। वह उन्हीं कांटों पर टिका है। उसकी उठती-गिरती सांसों में कांटे चुभ-चुभ जाते हैं और वह अपार पीड़ा से बिलबिला रहा है। अगर यह बीती सदी की किसी फिल्म का दृश्य होता, तो बैकग्राउंड में गाना बज रहा होता... हदे-निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है....। जहां तक निगाह जा पा रही थी, उसे धुंध ही धुंध ही दिखती है। खूब घना कांटों का जंगल।
उसने सोचा- क्या करूं? कहां जाऊं? कूद जाऊं यहां से? मरूंगा तो नहीं। हां, पूरा बदन छिल जाएगा जरूर। या ऊपर से नीचे गिरते वक्त मैं कांटों में फंस-फंस कर टुकड़े-टुकड़े बिखर जा जाऊंगा। लेकिन कूदने की जरूरत क्या है? हां, जरूरत है। जरूरत इसलिए कि मन में अथाह पीड़ा है और इतनी पीड़ा के साथ सिर्फ मरा जा सकता है, जिया नहीं जा सकता है।
पीड़ा क्यों है?
नहीं जानता, पर खुश रहने की कोई वजह भी तो नहीं है, इसलिए पीड़ा है, सिर्फ पीड़ा।
अरे पगले! सुबह-सुबह ये किस उलझन में फंस गया तू? देख, वह क्षितिज पर लाली छा गयी है। सूरज बस निकलने ही वाला है। दुनिया में यही समय तो सबसे शुभ होता है। रोज ही असंख्य आंखें तमाम-तमाम सपनों के साथ खुलती हैं और अपने-अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ती हैं।
हां, सही है। पर इसमें सुबह का क्या? वह तो आंखों और सपनों का जीवट है कि वे निराश सोते हैं और उत्साह से लबरेज हो फिर जाग जाते हैं। वे रक्तबीज हैं। वे मरते नहीं। वे मौत से परे हैं....। उनकी हर बंूद से एक नया सपना पैदा होता है.... उनका कोई बिगाड़ेगा क्या....।
इतने में सोच टूट गयी, जैसे हमेशा टूटती है। वह हंसा- सोच का टिका रहना कितना मुश्किल है!
अब तक काफी देर हो चुकी थी। रात का धुंधलका भी जा चुका था और सूरज उग रहा था- मलिन, फटा-फटा सा, बिखरा-बिखरा और अब खुद को इतना दीप्तिमान कर लेगा कि उसे देखा भी नहीं जाएगा। इसकी जगह कोई छोटा सा दिया होता तो उसके सहारे कुछ घड़ी कट सकती थी। इसे तो देखा ही नहीं जा सकता देर तक। इसके आने-जाने का कोई फर्क नहीं। मेरे लिए यह सुबह भी वैसी है, जैसी शाम गयी है। दिन भी वैसा जाएगा, जैसी रात गयी है। यदि मेरी पीड़ा बनी ही रहती है तो दिन हो या कि रात, मुझे क्या?
वह वापस कमरे में आ गया और फिर से बिस्तर पर लेट गया और चादर खींच ली। एकदम उतान लेटा हुआ चादर के भीतर-भीतर वह सोच रहा था कि यह सुबह वाकई कितनी खराब चीज है! रात भर कम-से-कम इतना सुकून था कि बेचैन मन से बिस्तर पर लेटा तो नींद आ गई और कुछ घंटे अपने को भूल गया....
...अरे हां, रात को मुझे नींद आयी। नींद यानी कुछ समय के लिए आदमी का करीब-करीब मुर्दा हो जाना, जो कि मैं कुछ घंटे लिए हो गया था। अपने को भूल गया था। अपने को भूलना कितना सुखद होता है! जरूरी भी। लेकिन रात वास्तव में कमाल की चीज है। वाह! रात वास्तव में....।
लेकिन मैं उसे सुखद क्यों कह रहा हूं? ठीक है कि कुछ घंटे मैं छटपटाया नहीं, तो चलो यूं कह लो कि मेरे लिए यह ठीक रही। उसका कारण हो सकता है कि मेरा पेट भरा हुआ था। मेरा बलात्कार भी नहीं हुआ था। मेरे साथ लूट भी नहीं हुई थी। क्या जो भूखे पेट सोया होगा, जो बलत्कृत हुआ होगा, जो लुटा होगा, उसके लिए भी यह रात इतनी ही सुखद रही होगी? वह तड़प उठा।
उसे मां याद आ गई। मां ने पिछले हफ्ते कहा था घर आने को। दो-एक दिन के लिए ही सही पर आ जाओ। लेकिन वह नहीं गया। ’’मां-बाप के पास जाने की फुरसत किसे है? जाएं भी तो करें क्या? बाप मुंह फुलाए रहेगा कि लड़का निकम्मा है क्योंकि बीस-बाइस बरस का हो गया है और अभी तक कहीं सरकारी बाबू नहीं हो पाया। और मां! वह तो हरदम रोती रहेगी। वह हरदम रोती रहती है। जब से होश संभाला है, देख रहा हूं कि वह रोती ही रहती है। मैं पैदा हुआ था तब का याद नहीं, पर यकीनन, वह तब भी रोई ही होगी। मेरे पैदा होने के पहले भी वह रोती रही होगी। उसे इतना तो समझ गया हूं कि दावे से कह सकता हूं-वह रोने के लिए ही बनी है। मैं कह सकता हूं कि उसके आंसू ही उसका जीवन हैं और मैं उस जीवन का कभी साथी नहीं बन सका। पर ये भी क्या बात हुई? हरदम रोते ही रहो। अरे जिससे आपको परेशानी है, उसका शमन करो, उसकी हत्या कर दो, खत्म कर दो सारे अवरोध और हंसो। मगर वह कहां मानती है? कहती है- इतने खतरनाक विचारों का आदमी मेरा बेटा नहीं हो सकता। अब जब वह खुद कह रही है कि मैं उसका बेटा नहीं तो मैं जाऊं क्यों उसके पास?...’’

सोच फिर टूट गई....।
उसने करवट बदली और अपने आप को कोसा- ‘‘यह मैं क्या-क्या सोचता रहता हूं। यह सब छोड़ो। वह मां है। बुलाती है तो जाना ही पड़ेगा। मां मैं आ रहा हूं। आ रहा हूं....बस, सारे काम जरा निपटा लूं फिर आता हूं...।’’
यह सिलसिला करीब दस सालों से चल रहा है। वह शायद रोज ही मां से वादे करता है कि वह जल्दी ही आएगा और रोज अपनी उलझनों में ऐसा व्यस्त हो जाता है कि घर जाने की योजना ही नहीं बन पाती। उसे समस्याओं का ऐसा अंबार दिखता है, जिसके आगे मां से मिलना बहुत छोटा और गैरजरूरी काम लगता है। हालांकि, मां के व्यवहार और बातों से लगता है कि मां सब बच्चों में उसे सबसे ज्यादा प्यार करती है। वह हमेशा उससे मिलने को छटपटाती रहती है। लेकिन उसे मां का इस तरह अधीर रहना अच्छा नहीं लगता।
-क्या रोज-रोज मिलना-जुलना? अरे! इतने सालों तक तो उसी के पास रहा हूं। अब अपना ही जीवन इतना भारी और खौफनाक हो गया है कि इससे वह दुखी ही होगी।

वह उठा तो दिन के तीन बज रहे थे। सोचते-सोचते जाने कब सो गया था, उसे पता भी नहीं चला। आंखें मीचते हुए उसने सिगरेट का डिब्बा उठाया और एक सिगरेट जला ली। उसने सोचा- यह धुआं भी क्या अजीब और अपरिहार्य चीज है, दुख की तरह पूरे जीवन साथ रहता है-जन्म से मृत्यु तक। धुएं के बारे में सोचते-सोचते वह सिगरेट का पूरा डब्बा खाली कर गया। दरवाजा बंद था और पूरे कमरे मंे धुआं-धुआं। ठीक ऐसे ही तो दिख रही थी आज की सुबह...। शाम भी ऐसी ही आएगी। बस धुआं... चारों ओर धुआं...।
वह बचपन से ही कुछ बातों को लेकर परेशान है और वह परेशानी अभी तक बनी हुई है। मसलन, सूरज का मन-मुआफिक रंग बदल लेना और आदमी का महज तमाशबीन होना। वह दो बातें इस जहान में बिल्कुल नहीं होने देना चाहता- एक यह कि चांद का आकार कभी छोटा न हो, और दूसरा यह कि कोई कभी आत्महत्या न करे। मगर यह दोनों बातें वह रोक नहीं पा रहा है। या यूं कह लो इसका शिकार खुद वह भी हुआ, जब उसकी प्रेमिका ने दीवारों से आजिज आकर आत्महत्या कर ली। वह दीवारें नहीं पसंद करती थी और उन्हें ही उसका नसीब बना दिया गया था। वह कहती थी-मेरा दम घुटता है। दीवारों को परे हटाओ और मुझे सांस लेने दो। दीवारों ने कहा-जितनी सांसें हम अता करें, वही तुम्हारा हक है। बाकी की आकांक्षाएं असंगत हैं। उसने विरोध किया और दीवारों की आगोश में ही खाक हो गई। दीवारें फिर भी रह गईं।
इन्हीं को ढहा देना उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

दीवारें इतनी बलवती कैसे हो गईं?

वह पहली बार जब गांव में लगने वाले मेले में उससे मिला तो दोनों में कोई बात नहीं हुई थी। बस, आंखों में ही कुछ कह गई थी। उसकी निगाहों में एक आह्वान था। दीवारें तब भी उसके साथ थीं, जो उसकी आवाज को नहीं रोक सकीं। लड़की ने आवाज दी-दीवारों से मुक्ति चाहिए। उसने जवाब दिया- मैं आपके साथ हूं, बाजुओं की ताकत बनकर। लड़ो, आत्मबल तुम्हारा, हुमस मेरी, बल मेरा। बाजू तुम्हारे, ताकत मेरी।
दोनों में एक मौन समझौता हो गया। दोनों ऐसे जुड़ गए जैसे कोई अपनी दोनों हथेलियों को आपस में भींच लेता है। वे चल पड़े। दीवारों से परे खुले खेत थे, खलिहान थे, सड़कें थीं, पार्क थे, बेहद जमीन थी, खुले आसमान थे। पर दीवारें साथ थीं... वे जन्म से साथ थीं।

इनसे मुक्ति का उपक्रम करना होगा। हम साथ हैं। करेंगे, वह सब जो करना पड़े। दो हथेलियां गुंथी हुई साथ-साथ चलने लगीं। लेकिन दीवारें भला इतनी उदार कब होने लगीं! वे और सिमट गईं। घेरा कसता गया।

दो मुलाकातों के बाद एक महीना बीत गया, वह नहीं दिखी। एक दिन उसे एक पत्र मिला। एक बच्चा लाकर दे गया। वह लड़की का चचेरा भाई था। उसके हाथ में एक चाॅकलेट था, जो उसके आधे मुंह में लिपट गया था। यह शायद पत्र पहुंचाने का मेहनताना था। वह दौड़ा हुआ आया और झट से उसे थमा दिया जैसे पहाड़ कंधे से उतार कर पटक दिया हो- यह लो, दीदी ने दिया है और भाग गया।
उसने पत्र खोला-
आकाश
उस दिन तुमसे मिलकर लौटी तो सबको पता चल गया था कि खेत में तुम मुझसे मिले थे। शायद पिताजी ने देख लिया था। तब से मुझे घर से बाहर कदम न रखने का कह दिया गया है। इस हिदायत के साथ कि अगर मैं घर से बाहर दरवाजे पर भी दिख गयी तो पांव काट लिए जाएंगे। लोग कितने कमजर्फ हैं। पांव कटने से किसी की यात्रा रुकी है भला। इन दीवारों में मेरा दम घुटता है। मेरी शादी की बातें चल रही हैं। मैंने मना किया और इस जुर्म में मां और पिताजी के हाथ दो-दो बार पिट चुकी हूं। वे लोग मुझे देखने आने वाले हैं। पहरे बढ़ गए हैं। हरदम कोई न कोई मेरे आसपास रहता है। खैर, तुम निश्चिन्त रहो। मुझे कोई कैद करके नहीं रख सकता। इस घर की रवायतों पर मेरा बस हो न हो, मेरी जान मेरी अपनी है। मैं उसकी मालकिन हूं। होगा वही जो मैं करूंगी। अगर यहां से निकल सकी तो यह देश छोड़ दूर निकल चलने के लिए तैयार रहना। अगर यह न हो सका तो मैं चिर यात्रा पर निकल जाउंगी। तुम अपनी दुनियादारी निपटाकर जब मौका मिले, आना। मैं इंतजार में रहूंगी। तुम खुद को कमजोर मत होने देना। इससे ज्यादा कुछ कह पाने का वक्त नहीं है। शेष मिलने पर... अगर मिल सके तो...

तुम्हारी
.....

आकाश किसी अनहोनी की आशंका से सिहर उठा।

तीन दिन गुजर गए उसने कोई संदेश नहीं भेजा। वह इंतजार करता रहा। उसके पत्रवाहक भाई की प्रतीक्षा करता रहा कि शायद कहीं दिख जाए तो खैरियत मालूम हो, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
वह सोच रहा था कि अगर किसी तरह वह एक बार उसे मिल जाए फिर दोनों ऐसे छूमंतर होंगे कि ईश्वर भी दोनों को खोज नहीं पाएगा।
उसे लेकर कहां जाएगा, कैसे रहेगा, क्या करेगा, इन्हीं बातों में सिर धुनते-धुनते पहली बार की मुलाकात उसके जेहन में ताजा हो गई।
बड़ी-बड़ी गोल आंखें। माथे पर नाखूनी का लंबा-पतला सा टीका लगा हुआ। छोटी सी उठी हुई नाक में पतले तार की नथनी। घुंघराले घने बालों में एक सादा सा रिबन। औसत कद काठी पर एक हरे रंग का सूट। कंधे पर आधी सरकी हुई ओढ़नी। आंख मिलाते ही उसकी आंखें भर आईं थीं। चेहरा लाल हो गया था। उन पनीली आंखों में एक तेज था। आत्मविश्वास था। जीवन जीने और प्रतिरोध करने का हौसला साफ झलक रहा था। नाम पूछने पर धीरे से बुदबुदाई थी- अंजू। जब तक सामने खड़ी रही, एक हाथ से दूसरे हाथ की उंगलियां तोड़ती रही और बस हां-हूं में जवाब देती रही। मुख्तसर सी मुलाकात करके चली गई थी। और चली ही गई....।

कोई तीन चार दिन गुजरे होंगे। आकाश दरवाजे के सामने जमीन पर माटी में ही पैर फैलाए बैठा था। सामने चटाई पर मां थोड़ा बाजरा सूखने को डाल गई थी। दाना थोड़ा था, चटाई उसके मुकाबले काफी लंबी चैड़ी। आकाश बार बार मुट्ठी में गेहूं भरता और फिर चटाई बिखेर देता। फिर बटोरता, फिर बिखेर देता। हल्का कुहासा था, कभी कभी सूरज थोड़ा सा झांकता, हल्की धूप झांकती और कुहासे में फिर से छुप जाती। अनायास गेहूं के दाने बटोरते-बिखेरते काफी समय गुजर गया। आकाश दानों से उलझा हुआ जाने किस सोच में डूबा था कि अचानक किसी के घबराए से पदचाप से उसका तंद्रा टूटी। बच्चा हाथ में चाॅकलेट लिए आया और आकाश के हाथ में एक कागज का आधा फटा तुड़ा मुड़ा सा टुकड़ा पकड़ाकर उसी वेग से लौट गया। आकाश ने इधर उधर देखा कि कोई देख न रहा हो और पत्र पढ़ने के जरूरी एकांत की तलाश में उठकर घर की एक तरफ चला गया। इंतजार के बावजूद आज जाने क्यांे उसे पत्र की आमद अच्छी नहीं लगी। उसने संभाल कर कागज का टुकड़ा सामने फैलाया। मात्र दो पंक्तियां थीं-
आकाश, आज मैं अपने सर पर लादे गए सारे बोझ से मुक्त हो रही हूं। आगे का रास्ता तुम्हें अकेले तय करना है। अपने लिए अच्छे रास्ते तलाशना। मैं चलती हूं। अलविदा...
आकाश को सांप सूंघ गया। अब क्या करे। क्या भाग कर उसके घर जाए और उसे उन दीवारों से हमेशा के लिए मुक्त करा ले... उसने कागज का टुकड़ा जेब में ठूंसा। कदम अंजू की घर की तरफ बढ़ चले। नहीं, यह नहीं हो सकता। मेरे रहते यह नहीं हो सकता। कदम और तेज हो गए। कलेजा मुंह तक आ गया-नहीं... नहीं... सुनो, तुम ऐसा नहीं करतीं। कोई भी दीवार इंसान के हौसलों से उंची नहीं हो सकती। एक छलांग मारो और इस पार आ जाओ, मैं इंतजार में हूं। फिर कोई नहीं पा सकेगा हमें... तुम ऐसा कतई मत करना। आकाश के घर से उसके घर तक पहुंचने में कोई पांच सात मिनट लगते थे। वह करीब पहुंचा तो अजीब चीख पुकार सुनकर ठिठक गया। अंजू के घर से अजब घबराहट भरी चीख बाहर आ रही थी। यह उसकी मां थी। जोर जोर से रो रही थी। अंजू जा चुकी थी।
वह उल्टे पांव लौट पड़ा। नहीं माना तुमने? मेरा कहा नहीं सुना तुमने? तुम इतनी बुजदिल हो गईं? यह तो नहीं होना था। अब....?
वह फफकते हुए खेतों की ओर बढ़ गया।

आकाश घंटों खेत में बैठा अंजू के बारे में सोचता रहा। कोई आदमी आत्महत्या कैसे कर सकता है? अनमोल जीवन को कोई इतनी आसानी से कैसे गवां सकता है? क्या परिस्थियां इतनी सशक्त हो सकती हैं कि आदमी उनसे हार जाए और पलायन का रास्ता चुन ले? लेकिन यह उसका विरोध भी तो हो सकता है। मौत का ख्याल कितना डरावना होता है, बावजूद इसके कोई मौत को गले लगा ले, अदम्य साहस भी तो है कि आपने अपने लिए सबसे डरावनी डगर चुन ली।

वह दो घड़ी रात बीते घर पहुंचा। दरवाजा खुला था, मां आंगन में पड़ी चारपाई पर गुमसुम बैठी थी। शायद उसी के इंतजार में। पहुंचते ही थोड़ा नाराज होती हुई बोली- कहां चले गए थे तुम? इतनी रात गए घर आ रहे हो, बता कर नहीं जा सकते थे। उसे झिड़कते हुए मां उसके लिए खाना ले आई। वह चुपचाप खाने लगा। खाना भीतर नहीं जा रहा था। वह पूरी ताकत से अंदर धकेल रहा था। मां से यह कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह खाना नहीं खा सकता। वह हजार सवाल करती, क्यों नहीं खाओगे? क्या खा कर आए हो? भूख क्यों नहीं है...वगैरह वगैरह।

वह चुपचाप निवालों से जूझ रहा था और मां उसे गांव में घटी आज की घटना के बारे में बता रही थी- अंजू ने फांसी लगा ली। वह दो दिन से बिस्तर से नहीं उठी थी। उसकी मां उसे खाना देने गई तो देखा वह छत से लटकी हुई है। मां सदमें में है। वह बार बार बेहोश हो जा रही है। सब बता रहे हैं कि वह किसी को चाहती थी, इसलिए फांसी लगा ली। बताओ, यह भी कोई चाहना हुआ? कैसे कैसे लड़के लड़कियां हैं आज के? पढ़ लिखकर सब अकारथ...
वह बीच में ही उठ गया- अब नहीं खाउंगा। उबकाई आ रही है। तबियत कुछ ठीक नहीं है...
मां ने दो-एक बार टोका, लेकिन सीधे घर से बाहर निकला और दालान में चला गया। ज्यादा न बोलने की आदत के कारण उसने मां को कोई जवाब नहीं देना पड़ा। यह भी नहीं कह सकता था कि जो हुआ, सब जानता हूं और कुछ हद तक मैं भी मर गया हूं। वह बेतरह चीखना चाहता था। इतना तेज कि उसकी आवाज पलायन कर गई अंजू तक पहुंच जाए। वह अपने बिस्तर पर आकर बैठ गया और बैठा रहा... सुबह तक।

कुछ समय बाद वह इलाहाबाद चला गया। उसे विश्वविद्यालय में दाखिला मिल गया था। विश्वविद्यालय पहुंचना उसके लिए बाकी युवाओं जैसा नहीं रहा। वह अंजू के साये से मुक्त नहीं हो सका। आकाश अकेला पड़ता गया। वह अपने व्यक्तित्व का विस्तार चाहता। वह कुछ करना चाहता। वह उन तारीकियों से लड़ना चाहता जिनमें अंजू खो गई, लेकिन अंत में वह हार जाता और उसी कमरे में उसे पनाह मिलती जिसमें करीब-करीब उसका दम घुटता। वह दिन भर इलाहाबाद की शांत चैड़ी सड़कों पर अकेला घूमता रहता। जैसे कि यहीं कहीं अंजू मिल जाएगी। संगम के तट पर, अकबर के किले में, सरस्वती घाट पर, कंपनी बाग में, भारद्वाज पार्क में, खुसरो बाग में, विश्वविद्यालय कैंपस में या किसी गली में। वह भीड़ में कभी पहुंचता तो बहुत तेजी से चारों ओर देखता। हर चेहरा उसे निराश-उतरा हुआ दिखता। हर ओर एक सुनसान सा मंजर, जहां न रहा जा सकता है और न किसी से बात की जा सकती है। अंत में निराश होकर वह लौटता और कमरे में बंद हो जाता... विह्वल... बेचैन...

उसे लगता कि इलाहाबाद एक सोया हुआ शहर है। यहां चारों ओर से इतने सारे युवा आते हैं और खामोश यहां से चले जाते हैं। यहां सबके कांधे पर एक गौरवशाली अतीत के सिवा कुछ नहीं है। यहां कुछ बदलता क्यों नहीं? यहां से कोई शुरुआत क्यों नहीं होती? यहां पर अब नए अध्याय क्यों नहीं लिखे जाते? उसने कोशिश शुरू की। वह कुछ युवा लेखकों को बटोरकर एक साप्ताहिक गोष्ठी आयोजित करने लगा, जिसमें दुनिया की तमाम दुश्वारियों पर बहस-मुबाहिसे होते। उनके उन्मूलन की योजनाएं बनतीं। युवा अपने जीवन लक्ष्यों पर चर्चाएं करते। वे विश्वविद्यालय में फैलती जड़ता को उखाड़ फेंकने की योजनाएं बनाते। वे परिसर में लागू होते आपातकाल के खिलाफ प्रस्ताव पारित करते। वे वहां तैनात बंदूकों के विरोध नारे लगाते और उन्हें परिसर से बाहर करने की मांग करते। वे अपनी कविताओं और कहानियों में एक यूटोपिया गढ़ते और उसे साकार करने के सपने देखते। आकाश को इन सबमें अपनी निराशाओं से थोड़ी राहत मिलती। वह सोचता कि मैं उन तमाम दीवारों को ध्वस्त करूंगा जिनसे लड़ते-लड़ते अंजू शहीद हो गई।
आकाश के जो कुछ नजदीकी साथी थे, उन्हीं में से एक थी काव्या। वह हिंदी की शोधछात्र थी और विश्वविद्यालय के हाॅस्टल में रहती थी। आकाश से उसकी गहरी दोस्ती हो गई थी। वह रिसर्च करने के बाद एक महिला संगठन बनाना चाहती थी ताकि महिलाओं के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न से लड़ सके। इस काम में उसने आकाश से भरपूर सहयोग का वादा लिया था। वह स्त्रियों के रहने लायक एक दुनिया का सपना देखती थी और उस दुनिया की तस्वीर वह कहानियों और कविताओं में उतारा करती थी। उसे आकाश की सारी कहानी पता थी और कहा करती थी कि अब इस तरह किसी और अंजू को मरने नहीं देना है।
काव्या के रिसर्च गाइड प्रोफेसर साहब काफी पहुंचे हुए आदमी थे। वे अध्यापक संघ में सक्रिय थे और विश्वविद्यालय प्रशासन में काफी पहुंच रखते थे। वे शोध परंपरा के मुताबिक, उससे अपने बहुत सारे व्यक्तिगत काम करवाते, जिससे वह त्रस्त रहती थी और जल्द ही अपना रिसर्च पूरा कर उनसे मुक्त हो जाना चाहती थी।
प्रोफेसर साहब ने एक रोज उसे अपने घर बुलाया। वहां से लौटने के बाद वह बहुत परेशान थी। वह अपनी रूम पार्टनर सहेली से लिपट कर खूब रोयी। बहुत कुरेदने पर बताया कि प्रोफेसर साहब ने उसके साथ जबरदस्ती की है और कहा है कि यदि वह इसके विरोध में कुछ करेगी तो उसे अपने रिसर्च से हाथ धोना पड़ेगा। सहेली देर तक उसे समझाती रही और सो गई।
अगली सुबह सहेली जागी तो देखा काव्या पंखे से लटकी हुई है।
आकाश ने अपने साथियों के खिलाफ मिलकर प्रोफेसर साहब के खिलाफ अनशन शुरू किया। तमाम विद्यार्थी उसके साथ आ गए और विश्वविद्यालय परिसर का कामकाज ठप हो गया। विश्वविद्यालय प्रशासन हरकत में आया और आकाश को साथियों सहित  पुलिस उठा ले गई। उसे दो दिन जेल में पीटा गया फिर छोड़ दिया गया। उसे व्यवस्था भंग करने के आरोप में विश्वविद्यालय से हमेशा के लिए निकाल दिया गया और मामला शांत हो गया।
उसने साथियों संग मिलकर काफी कोशिश की कि मामले में कोई कार्रवाई हो, प्रोफेसर साहब के खिलाफ जांच हो, उन्हें हटाया जाए, लेकिन कुछ नहीं हुआ। जो विद्यार्थी उसके पक्ष में आए थे वे सब अपने-अपने कामों में मशगूल हो गए। अब वह उनसे इस बारे में कुछ कहता तो वे उसकी हां में हां तो मिलाते, पर कुछ करने के नाम पर कन्नी काट जाते।
आकाश ने बहुत दिनों तक इस सिलसिले में कोशिश की और फिर चुप रह गया, लेकिन जब भी वह अकेला होता, उसे उस लड़की के ख्याल परेशान करते। उसे लगता कि प्रोफेसर ने उसकी आंखों के आगे काव्या का कत्ल किया, जैसे अंजू को मारा गया था और वह कुछ नहीं करता। वह कभी आईने के आगे खड़ा होता तो आईना उसे चिढ़ाता कि तुम दो दो हत्याओं के चश्मदीद हो। किस मुंह से खुद से आंख मिलाते हो। वह आईने के सामने से हट जाता। उसे रात को सपने आते कि तुम कायर हो, तुम किसी निर्दोष की हत्या पर चुप हो, तुम हत्या में शामिल हो। तुम हत्यारे हो...

इन्हीं उलझनों में उसे तीन साल गुजर गए और उसका एक दोस्त उसे दिल्ली ले आया।
दिल्ली एक चीखता हुआ घबराया, डरा-सहमा सा शहर। चैड़ी मगर बोझिल सड़कें। बेहद भीड़। बलत्कृत होती यतीम गलियां। चारों तरफ विचरती निराशाएं। निरी अकेली, उदास भटकती निरुद्देश्य संवेदनाएं। किसी की किसी से कोई पहचान नहीं। कोई संभावना भी नहीं। भविष्य का कोई सार्थक सपना नहीं। इंसानों के लिए कोई जगह नहीं। एक दरीचा सामने वाले दरीचे को देख कर मुस्कराता नहीं। दीवारें सामने ही खड़ी दीवारों को छूना पसंद नहीं करतीं। वे आपस में बात नहीं करतीं। गोलियों का शोर, संगीनों का खौफ, बारूदों की गंध। आज के सारे पन्ने झूठे सुनहरे वादों से लदे, वर्तमान के चेहरे पर भ्रष्टाचार की कालिख पोते हुए। सत्ता के सारे पाये अपना-अपना चेहरा मुखौटों से मूंदे। सबके पीछे एक डरावनी सूरत। तमाम जनता की उड़ती विह्वल आवाजें और सिंहासन के ढंके हुए कान। उनके कदमों से शैतानी आहट। वह घबरा उठा। यह कहां आ गया हूं। यह कौन सी जगह है। मेरी आंखों में दो और आंखों के सपने हैं, उन्हें कैसे सहेजूंगा। उन्हें लेकर कहां जाउंगा। कहां रखूंगा। पर वापस लौटने की कोई गुंजाइश नहीं। रहना होगा, यहीं इन सबसे एक साथ लड़ना होगा।
हालांकि, अब वह खुद ठीक-ठीक नहीं जानता था कि वह आगे क्या करेगा या क्या होगा?
दिल्ली पहंुच कर उसने मुखर्जी नगर में एक कमरा लिया। मुखर्जी नगर अब तक इलाहाबाद की तरह सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले युवाओं का गढ़ बन गया था। चारों ओर छात्रों की बेहद भीड़ होती, लेकिन उसे इन लोगों में, भीड़ में या दुनिया जहान में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह अक्सर कमरे से निकलता और व्यस्त सड़कों को फलांगता हुआ किसी सुनसान पार्क में जाकर बैठ जाता। घंटों बैठा रहता फिर व्यग्र हो इधर-उधर घूमता और वापस आ जाता।
आकाश खुद के भीतर के द्वंद्व से इस कदर उलझ गया था कि आगे के बारे में कुछ भी सोच सकने की ताकत खो चुका था। अब वह आईने के सामने पहुंचकर डरता नहीं था, घबराता नहीं था, बल्कि उसकी आंखों में आंखें डाल कर कहता-हां, मैं कायर हूं। मैं हत्यारा हूं। तमाम तमाम अंजुओं-काव्याओं का हत्यारा... मैं हत्यारा हूं...

उसने पढ़ाई के या नौकरी के बारे में सोचना बंद कर दिया। शायद इस तरफ उसका ध्यान नहीं जा सकता था। उसने कोई दोस्त नहीं बनाया था। जिन दोस्तों के साथ वह दिल्ली आया था, अब उनसे भी मिलने नहीं जाता था। उसे लगता कि काव्या की मौत के बाद इन लोगों ने मेरा साथ नहीं दिया। फिर इनका कैसा साथ... ये क्या करेंगे? वे सभी कभी मिलने आते तो वह बस यूं ही मिल लेता। बिना किसी दिलचस्पी के। वह कोशिश करता कि किसी के सामने न पड़े। वह दिन भर कमरे में बंद रहता और जब अंधेरा हो जाता तो घर से निकलता। चुपचाप चलता जाता और जब थक कर चूर हो जाता तो देर रात गए लौटता और खुद को कमरे में बंद कर लेता। उसने अब खुद पर कोई ध्यान देना बिल्कुल छोड़ दिया। या कहें छूट गया। दाढ़ी बढ़ी हुई। बाल बढ़े हुए। करीब करीब डरावनी सूरत। हमेशा चुप चुप रहना। अगल बगल के लोग उसे संदेह की निगाह से देखते और उसके मकान मालिक को आगाह करते कि यह आदमी ठीक नहीं दिखता है। इससे होशियार रहना। उसके भीतर के युद्ध से कोई भी वाकिफ नहीं था।

एक रोज वह यूं ही घूमने निकला और रोज की तरह करीब बारह बजे के आसपास आकर फिर कमरे में बंद हो गया। उसी समय दिल्ली के सरोजिनी नगर में विस्फोट हो गया। बीस लोग मारे गए और करीब साठ लोग घायल हो गए। विस्फोट रात करीब नौ बजे हुआ था, जब वह घर से बाहर था, हालांकि वह हमेशा की तरह इस घटना से बेखबर था। विस्फोट के बाद उसके पड़ोसी मकान मालिक के पास पहुंचे और कहा- देखा, हम कहते थे। टीवी पर आतंकी का जो हुलिया बताया जा रहा है, वह बिल्कुल इसी आपके किरायेदार जैसा है। अपनी खैर चाहो तो पुलिस को फोन कर दो, वरना पकड़े गए तो जिंदगी जेल में सड़ जाएगी। मकान मालिक ने बिना कुछ सोचे झटपट पुलिस को फोन मिलाया और बताया कि उसके मकान में एक आदमी रहता है। उसका हुलिया बिल्कुल वैसा ही है जैसा आतंकी का बताया जा रहा है। कुछ ही मिनट में पुलिस आ गई। आकाश अभी-अभी घूम कर लौटा था और अंदर से दरवाजा बंद किए लेटा था। पुलिस ने दरवाजा खुुलवाया और बिना कुछ कहे उसे उठा ले गई। मकान मालिक और मोहल्ले वालों ने उसकी गतिविधियां पुलिस को बता दीं कि वह सिर्फ रात में निकलता है। वह अकेला ही रहता है, उसका कोई दोस्त नहीं है। वह छुप छुप कर आता जाता है। उसकी बड़ी बड़ी दाढ़ी है। वह निश्चित ही आतंकी है।

पुलिस ने अदालत को बताया कि इसका असली नाम अयूब खान उर्फ अबू हमजा उर्फ पप्पू है। आकाश इसका झूठा नाम है। पहचान छुपाने के लिए रख लिया है। इसके खिलाफ चार और धमाकों में शामिल होने के सबूत हैं। आकाश ने अदालत में अपनी सफाई में कुछ नहीं कहा। उसे पुलिस हिरासत में जेल भेज दिया गया।

Sunday, May 26, 2013

खरीद-फरोख्त


माधव ने करवट बदलनी चाही तो पांव में जोर से टीस उठी और पट्टी के ऊपर तक खून झलक आया। माधव की आंखें भर गईं। वह दर्द से बिलबिला उठा। उसकी हालत देख मालती दौड़कर आई और उसके सिर पर हाथ फिराने लगी। यह इत्तेफाक ही है कि मालती बचपन से एक पैर से विकलांग थी और अब आधी उम्र में आकर माधव भी अपना एक पैर गवां बैठा। पैर कई जगह से टूट गया था। एक महीने से माधव चारपाई पर पड़ा है। चकनाचूर हुई हड्डियां कैसे जुड़ेंगी, यह उसका ईश्वर भी नहीं जानता।
माधव दिहाड़ी मजदूरी करके पेट पालता था। कभी कभी तो गांव के बाबू साहबान की बेगारी में ही दिन गुजर जाया करता था, लेकिन अब तक कम से कम खाने के लाले कभी नहीं पड़े। यूं तो दलितों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बन गया था, लेकिन माधव कहता कि न जमीन न जायदाद, जिनकी खाते हैं, उन्हीं से रार ठान लेने से क्या होगा। रोजी-रोटी में खलल पड़ेगा, सो अलग से। हमें खाने के लाले पड़े रहते हैं, सरकार ससुरी चूतियापे में उलझी रहती है। हरिजन एक्ट आ गया तो हमें रोटी तो नहीं मिल गई। करनी तो दूसरे की बेगार ही है।
उसकी बाजुओं में ताकत थी और खून-पसीना बहाकर रोटी का जुगाड़ होता था। उस दिन वह ठेकेदार रघुराज सिंह के साथ गया था ट्रक पर लकड़ी लदवाने। दो लोग ऊपर से रस्सी में बांध कर सिल्ली खींच रहे थे। दो लोग नीचे से लट्ठे से ठेल रहे थे। माधव भी नीचे ही था। अचानक रस्सी टूट गई। माधव के साथ लगा दूसरा आदमी झट से अलग हो गया और सिल्ली सीधे आकर माधव के पैर पर गिरी। माधव का पैर जब तक लकड़ी के नीचे से निकाला गया, तब तक माधव अधमरा हो चुका था। ठेकेदार उसे लदवाकर अस्पताल ले गया और प्राथमिक चिकित्सा के बाद लाकर घर छोड़ दिया।
माधव का पैर बुरी तरह छीछालेदर हो गया था। डाॅक्टर ने कहा था किसी बड़े अस्पताल ले जाकर आॅपरेशन कराना होगा, लेकिन ठेकेदार ने कान नहीं दिया। अगले दिन माधव की जगह दूसरा मजदूर आ गया और ठेकेदार का धंधा पूर्ववत रफ्तार पर आ गया।
माधव का जीवन नरक हो गया। बिस्तर पर पड़ा-पड़ा दर्द से बिलबिलाता रहता। पैर पर बंधी पट्टियां खून से सनी रहतीं, जिस पर मक्खियां भिनकने से रोकने के लिए मालती हरदम उसके पास बैठी पंखा डुलाती रहती। माधव को दर्द से बिलबिलाता देख जार-जार रोती रहती।
बिस्तर पर पड़े-पड़े महीना भर गुजर गया, माधव दोबारा डाॅक्टर के यहां नहीं जा सका। किसी भी दिहाड़ी मजदूर की तरह उसके कलाई की ताकत ही उसकी संपत्ति, उसका बैंक-बैंलेंस थी। सुबह से शाम जितना खटता, शाम को उतना ही लेकर लौटता और जिंदगी एक दिन आगे खिसक जाती। एक हादसे ने उससे सब छीन लिया। पूरा परिवार अब सूखी रोटी को भी मोहताज हो गया, जो कम से कम एक जून तो मिलती ही थी।
उसकी बीवी जब तब ठेकेदार के दरवाजे जाती, बड़ी देर तक रिरियाती-रोती और चली आती। एक रोज ठेकेदार ने दुत्कार कर भगा दिया। वह रोती-फफकती लौट आई और फिर कभी किसी से कुछ कहने नहीं गई।
जिसका कोई नहीं होता, उसे अपने बल, अपने तौर-तरीके पर ही भरोसा होता है। अपने आसपास की प्रकृति, जल-जंगल पर भरोसा होता है। उसी में उसका विज्ञान-भूगोल सब रचा बसा होता है। यही मालती के साथ शुरू हो गया। अब वह माधव की चटनी हो गई टांग पर तरह के घरेलू नुस्खे आजमाने लगी। खर-पतवार पीस कर लेप लगाती। कभी हल्दी-तेल में लपेट कर बैंगन बांधती। पर इससे क्या होना था। पैर का तो जैसे कीमा बन गया था। गांव के लोग अपनी-अपनी सहानुभूति लेकर आते और देकर चले जाते। साथ ही कुछ सलाह भी दे जाते कि ऐसा करो, वैसा करो।
मालती ने एक रोज गांव में कई लोगों से थोड़ा थोड़ा करके दो हजार रुपये कर्ज लिए और माधव को रिक्शे पर लाद कर अस्पताल ले गई। दो हजार रुपये उसकी जांच के लिए भी अपर्याप्त थे। मालती निराश हो माधव को लेकर लौट आई और फिर अस्पताल जाने के बारे में सोचना छोड़ दिया।
माधव जैसे करवट लेता या हिलने की कोशिश करता, घाव से खून छलक आता। वह इतनी जोर से चीखता कि जैसे आसमान फटा हो। वह बार-बार कहता- ऐसे जीने का क्या फायदा। इससे अच्छा तो मर जाता।
एक दिन गांव के एक बुजुर्ग ने सलाह दी- अरे मालती, कुछ इंतजाम करो भाई! ऐसे घुरच-घुरच कर मर जाएगा बेचारा। मालती बोली- क्या करूं मालिक। कोई जमीन जायदाद, गहना जेवर होता तो वही बेंच देती। मेरे पास तो कुछ है भी नहीं, कहां से लाउं, क्या करूं।
- अरे क्यों नहीं है, घर तो है। दस, बीस गज जितना है, कुछ तो आएगा। बेच दो या गिरवी रख दो। मार डालोगी उसे। मालती बोली- बेच दूं, मगर ये दो छोटे-बच्चे रहेंगे कहां? हमारे पास जो कुछ जमा-पूंजी है, यही एक घर तो है।
घर दांव पर लगा कर पैसा जुटाने की सलाह इतने लोगों ने दे डाली कि मालती को भी यही ठीक लगा और आखिर उसने गांव के ही एक व्यक्ति को पच्चीस हजार रुपये मंे घर गिरवी रख दिया। मालती ने भले इतनी रकम जीवन में पहली बार देखी हो, लेकिन माधव के इलाज के लिए वह ऊंट के मुह में जीरा थी। माधव की जो हालत थी, उसमें उसका न बच पाना पहले से तय था। वह बच सकता था यदि उसके पास किसी डाक्टर को थमाने के लिए अथाह रोकड़े होते। नेता से सिफारिश लगवाने के लिए रसूख होता। अधिकारी को घूस देने के लिए पैसे होते।
माधव के पैर पर प्लास्टर बंध गया और इतने में ही सब पैसे फुर्र हो गए। मालती उसे लेकर फिर घर आ गई। अब आगे की दवा कैसे हो?
गांव के कुछ लोग ठेकेदार को दबी जुबान भला-बुरा कहने लगे। यह बात ठेकेदार तक पहुंची। उसके गुर्गों ने सलाह दी-मालिक आप ही के सर कालिख लगेगी। सब कहते हैं कि गरीब गुरबा है। उसकी टांग तोड़कर फेंक दिया। नीच जाति के सब लोग आपको ही बद्दुआ देते हैं।
ठेकेदार का दिमाग ठनका। उसने अपने बुजुर्ग गुर्गे को जुगत ढूंढने की जिम्मेदारी सौंपी। बुजुर्ग गुर्गे ने उपाय ढूंढा और ठेकेदार से सलाह मशविरा कर पहुंच गया मालती के घर। गुर्गे ने मालती से कहा-देखो मालती, यह मर जाएगा तो बड़ा पाप लगेगा। अब तुम्हारे पास बच्चों को पालने के लिए भी कुछ नहीं है। घर भी गिरवी है। बिटिया तुम्हारी बारह साल की हो गई है। हमारी मानों तो इसका बियाह कर दो। पचास हजार रुपये दिला दूंगा। माधव की दवा भी हो जाएगी और बेटी की शादी भी निपट जाएगी। दो-दो बोझ एक साथ उठ जाएगा। मालती ने पूछा-बियाह कराओगे किससे? गुर्गे ने कहा-मेरी रिश्तेदारी में एक हैं तुम्हारी ही बिरादरी के, थोड़े गर्जवान हैं। उन्हीं को कन्यादान कर दो। मालती ने ज्यादा छानबीन नहीं की। उसे  पति की जान बचाने का लोभ हो गया। सोचा-ऐसे भी यहां भूखों मरती है। तीन दिन से चूल्हा नहीं जला है। जाएगी कहीं तो कम से कम दो जून की रोटी तो मिलेगी। मालती ने दिल पर पत्थर रखकर सौदा तय कर लिया।
अगले दिन गुर्गा बच्ची को यह वादा करके अपने साथ ले गया कि यहां विवाह वगैरह तो हो नहीं सकता। वहीं कहीं मंदिर में करा देंगे। तुम चिंता न करो। तुम्हारी बेटी तो हमारी भी बेटी ही है। जब दुर्दिन आतें हैं तो अक्ल भी मारी जाती है। मालती इस सबके पीछे का षडयंत्र नहीं सोच सकी। गुर्गे ने ठेकेदार से पचास हजार रुपये लेकर मालती को दिए और बच्ची को एक लाख में बेच दिया। पचहत्तर हजार ठेकदार ने ले लिया और पच्चीस हजार गुर्गे ने। मालती अगले रोज माधव को लेकर फिर अस्पताल गई।
जिस दिन माधव की मौत हुई, गुर्गे ने ठेकेदार को बताया कि जिसे लड़की बेची थी, उन्होंने भी डेढ़ लाख में किसी और को बेच दी। मालती-माधव को यह बात कभी पता नहीं चल सकी।

Thursday, February 7, 2013

मुआवजा


जिस समय वह अपने जीवन के लक्ष्य तय करने की कोशिश में था, उसी समय कश्मीर से कन्या कुमारी तक दमन के तमाम वृत्तांत समय की दीवार पर दर्ज हो रहे थे। गांधी की हत्या के 62 साल गुजर चुके थे। हर तरफ लाशों पर राजनीति करने वालों की भीड़ थी। गली-कूचे में तमाम स्वयंभू नायक पैदा हो गए थे। राजनीति विचारशून्यता के समन्दर में बिला गई थी। चारों ओर बेतरह कोलाहल था। वह मुसलसल देख रहा था कि न्याय एक झूठी चीज है, जो कहीं नहीं पाई जाती। समता एक आदर्श विचार है, जो इस धरातल पर असंभव दिखता है। और उसका विश्वास दिनोदिन पुख्ता होता जाता था। सत्ता द्वारा लोगों का दमन जारी था। राजकीय नियोजन में लोगों को मरने के लिए मजबूर करने के पर्याप्त प्रावधान हो रहे थे। इस काम में पुलिस की बंदूक से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक के दस्तावेज तक उपयोगी साबित हो रहे थे। यह सब देख-देख वह बहुत हैरान होता कि आदमी से उसकी रोटी छीन ली जाती है और उसकी मौत की वजह टीबी, कैंसर या प्राकृतिक आपदा बताई जाती है।
यह कहानी ;जिसे आप राजकीय हत्याओं की रिपोर्ट भी कह सकते हैं. उस सब की एक झांकी भर है जो फिलवक्त घट रहा है। इस कहानी को कोई कहानी मानने से इनकार करे और इतिहास के पन्ने का एक पैराग्राफ कह बैठे तो मुझे कोई उज्र नहीं। वैसे भी, किसी दौर का हर फसाना उस दौर का इतिहास ही है।
यह कहानी कहने की मुश्किल यह है कि किसे शामिल किया जाए और किसे छोड़ा जाए। कथा लंबी है, शब्द बहुत कम हैं और पात्र असंख्य। कुछ भूख से मर गए, कुछ के घर छिन गए, कुछ को गोली मारी गई, कुछ पलायन कर गए, कुछ ने रसायन पी लिया, कुछ ने फांसी लगा ली। उनकी रोटियों की आंच पर तख्तो-ताज चमके, एयरलाइंस की उड़ानें आजाद हुईं। कुबेरों के खजाने भरे गए। उन्होंने अपना हक मांगा तो लाठियां और गोलियां मिलीं। उनकी जमीनें छीन कर नुमाइश घर खोल दिए गए। जिन्होंने प्रतिरोध किया, वे मारे गए। उनकी औरतों का बलात्कार हुआ।
त्रासदी भुगत रहे लोगों का हाल ठीक-ठीक बयां नहीं किया जा सकता। बस अंदाजे लगाए जाते हैं कि करीब पांच करोड़ लोग बेघर हुए या डेढ़ लाख लोगों ने खुदकुशी की आदि-आदि। चावल पक गया है, यह जानने के लिए जैसे हांड़ी से एक सीत भात टटोल लेते हैं, उसी तरह समय की हांड़ी का हाल जानने के लिए आपको ले चलते हैं गांव चमौली। इस कहानी को अपने समय की एक धुंधली झलक भर समझा जाए।

किसी भी भारतीय गांव की तरह जीवन और सपनों से भरा एक गांव था चमौली। भौतिक अभावों के बीच प्राकृतिक समृद्धि का एक गांव। चारों ओर हरियाली। हर तरफ खुशहाली। मेहनतकश लोगों का हंसता-खेलता एक गांव, जो सुबह ओस में नहाई घास की चादर ओढ़े उठता और शाम को घर आते ढोरों के पैरों से उड़ी धूल में नहाकर रात की आगोश समा रहता। चारों ओर से बाग-बागीचों की हरियाली से घिरे इस गांव के लोगों की मुख्य आजीविका खेती थी। किसी-किसी घर से एकाध लोग नौकरी-पेशा भी थे। तमाम बच्चे पढ़-लिखकर बड़े होकर डाक्टर, इंजीनियर, अफसर आदि बनने के सपने देख रहे थे, तो कई युवक किसी-किसी शहर जाकर जीवन की गाड़ी खींचने का जुगाड़ तलाश रहे थे। इन्हीं में से एक था अनुज।
अनुज जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एमए करके लौटा तो गांव की चैपालों में बतकूटन के एक नए मुद्दे के बतौर शामिल हो गया। उसे लेकर गांव में एक जुमला चल पड़ा था- पढ़े फारसी बेचैं तेल, यह देखौ किस्मत कै खेल.....।
बुजुर्गवार कहते-अरे भाई, हम पढ़े लिखे नहीं थे तो भी तो हमने खेती की। उसने तीस बरस की उम्र पढ़ाई में लगा कर क्या उखाड़ लिया। अब वह भी खेती ही करेगा। मूर्खो का कहीं गांव बसता है क्या? इतनी उम्र में तो हम पांच बच्चों के बाप थे। जब खेती ही करनी थी तो दिल्ली पिल्ली जाकर लाखों रुपया क्यों फूंक आया?
लेकिन यह हंसी-मसखरी कुछ ही दिन की थी। थोड़े ही समय में गांव वालों के लिए अनुज मिसाल बन गया। फिर गांव वाले कहने लगे- भाई मेहनत का वाकई कोई तोड़ नहीं होता। उस पर भी आदमी पढ़ा-लिखा हो, फिर तो क्या कहने? जिन खेतों में मुश्किल से खाने पीने भर का उगता था, उन्हीं से अनुज लाखों रुपये पीट रहा है। बड़ा सपूत है, भगवान ऐसा बेटा सबको दे।
अनुज ने अपने को पूरी तरह खेती में झोंक दिया। नई-नई तकनीकों और तरीकों का इस्तेमाल करके उसने ऐसा कमाल किया कि क्या कहने? उसके खेत बाकियों से एकदम अलग दिखते, लहलहाते हुए। आस-पास के गांवों से लोग उसकी फसलें देखने आते। तमाम लोग उससे फसल उगाने के नुस्खे पूछते। दो तीन सालों में ही पूरे इलाके में जैसे बहार आ गई। अनुज से प्रेरित हो-होकर सबके खेतों में अब नगदी फसलें उगाई जाने लगीं। लोग खेती के जरिए ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के बारे में सोचने लगे।
इसी बीच अनुज को एक निजी कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव आ गया। अच्छा पैसा मिलना था। घर वालों की इच्छा थी कि अनुज नौकरी ज्वाइन कर ले। बाप ने कहा- यह खेती किसानी क्या दे पाएगी? देखो न! जब-तब यहां-वहां सुनने को मिलता है कि किसान मजदूर निराश हो होकर फांसी लगा लेते हैं। किसानों के लिए बहुत खराब दौर आ गया है। दो-चार सीजन फसल अच्छी गई तो इसका मतलब यह तो नहीं कि जीवन भर का ठिकाना हो गया। अभी सूखा पड़ जाए तो लो हो गई खेती। जाओ अपना भविष्य देखो......।
और घर वालों के दबाव में मन मार कर वह नौकरी के लिए फिर वापस दिल्ली चला गया।
नौकरी करने की सोच कर बचपन से ही उसका मन बिदकता था। उस पर विश्वविद्यालय के माहौल ने उसे और स्वतंत्र मिजाज बना दिया। वह साथियों से कहता- नौकरी जीवन भर एक गुलामी का बोझ ढोने के सिवा और क्या है? रोज-रोज खुद को ऐसे कामों में झोंकना, जिसके लिए आपकी आत्मा गवारा न करती हो। नौकरी आपको जीवन में कोई रचनात्मक काम नहीं करने देती, क्योंकि नौकरी देने वाला आपसे अपने लिए काम कराता है और निजी हितों में किए जाने वाले काम रचनात्मक हो सकते हैं भला? अनुज का स्वतंत्र मिजाज व्यक्तिव नौकरी जैसा बोझ ज्यादा दिन तक नहीं ढो सकता था।
कुछ महीने के बाद बीते कि एक दिन उसने पिता को फोन किया कि वह घर वापस लौट रहा है और खेती ही करेगा। इस पर घरवाले काफी नाराज हुए-‘आज के जमाने में कहां नौकरी मिलती है? मिली-मिलाई नौकरी छोड़ रहा है, कल को पछताएगा।‘ अनुज ने कहा- ‘मैं नौकरी नहीं कर सकता, वहां मेरा दम घुटता है।‘
आखिरकार वह लौट आया, लेकिन उसके आने से पहले ही उसके सोना उगलने वाले खेतों को ग्रहण लग गया।
जब पहली बार जमीन के अधिग्रहण के लिए पैमाइश करने वाली टीम आई तो ग्रामीणों ने लाठियां लेकर उन्हें दौड़ा लिया। अधिकारी भाग खड़े हुए। गांव वालों ने सोचा कि बला टली। हमारी जमीन बच गई, लेकिन दो दिन बाद पुलिस का दल फिर पहुंचा और सरपंच सहित गांव के कुछ अगुआ लोगों को थाने ले गया। पूरे गांव वालों के नाम थाने में रिपोर्ट दर्ज की जा चुकी थी। पुलिस के आला अधिकारियों ने सरपंच और उनके साथ गए लोगों को समझाया- देखो, हमारी बात ध्यान से सुनो। सरकार ने फैसला किया है कि इस इलाके से कुछ जमीन लेकर एक ऐसा क्षेत्र विकसित किया जाएगा जहां पर वैज्ञानिक ढंग से खेती होगी। यह काम उद्योगपतियों को सौंपा जाएगा। वे यहां विकास के लिए उद्योग लगाएंगे। फैक्ट्रियां लगाएंगे। वे यहां पर अमेरिका के टक्कर की उम्दा फसलें उगाएंगे।
गांव वालों ने कहा- तो हम क्या ईंट-पत्थर उगाते हैं? जो हम उगाते हैं वह अनाज नहीं है? हमको सिखाने आए हैं आप? नेता नूती से कह दो कि हमारी जमीन जायदाद से नेतागिरी न करें। हमारी जमीन है, जो उगाना है हम उगाएंगे। हम अपनी जमीन नहीं देंगे।
अधिकारियों ने कहा- देखिए! सरकार का प्रोजेक्ट है, टल नहीं सकता। इसे जैसे भी हो, पूरा करना है। अगर आप लोग अड़ंगा लगाएंगे तो पुलिस किसी भी तरह की कार्रवाई करने को मजबूर होगी। यह अंतिम चेतावनी है।
जवाब में गांव वालों ने कहा- देखिए साहब! हमारी जमीन हमारी मां है। वह हमारी इज्जत-आबरू है। हम जान दे देंगे पर जमीन नहीं देंगे। आप सरकार तक हमारी बात पहुंचा दीजिए कि यह हमें मंजूर नहीं है।
पुलिस ने कोई तर्क सुने बगैर पैमाइश की तारीख तय कर दी और गांव के सरपंच को सूचना दी कि फलां तारीख को जमीन नापी जाएगी। गांव वालों में विचार-विमर्श हुआ। युवा गुस्से में थे तो बुजुर्ग चिंतित। खूब मंथन के बाद भी यही राय बनी कि हम अपनी जमीन कैसे दे सकते हैं? क्या बचेगा हमारे पास? हम तो निहंगम हो जाएंगे। नहीं, यह नहीं हो सकता। हम लड़ेंगे। आखिरी सांस तक लड़ेंगे। हम अदालत जाएंगे। हमारी जमीन हमारी जान से कम कीमती नहीं है।
तय तारीख को जमीन की नाप के लिए दोबारा टीम आ गई। साथ में जिलाधिकारी और भारी संख्या में पुलिस बल। उन्हें देखते ही गांव वालों में खलबली मच गई। सरपंच और दूसरे बड़े-बुजुर्ग वहां पहुंचे, तब तक जमीन की पैमाइश कर उसे चिन्हित करने का काम शुरू हो चुका था। गांव वालों ने ऐसा करने से मना किया तो डीएम ने काफी तल्खी से जवाब दिया- देखिए! हजार बार बता चुका हूं। मैं अब और नहीं समझा सकता। हटो यहां से.... जाओ सब अपना-अपना काम करो। चलो हटो..हटो यहां से...और पुलिस ने डंडे भांजने शुरू कर दिए। कुछ एक लोगों को डंडे पड़े और सारे लोग वहां से भाग गए।

जब पहली बार अखबार में छपा था कि इलाके में सेज बनेगा तो गांव वालों को समझ में ही नहीं आया कि यह सेज क्या बला है। बस उनकी समझ में इतना आया कि हमारी जमीनें हमसे ली जाने वाली हैं। जिनके पास इफरात जमीन है, उनकों चिंता हुई कि काश्तकारी छिन जाएगी, जिनके पास दो-चार बीघे ही हैं, उनके प्राण हलक में आ गए कि अब क्या होगा! बाजुओं की ताकत और इन दो-चार बीघे खेतों के सिवा क्या है उनके पास। गेहूं-चावल उपजा लेते हैं तो साल भर के लिए सूखा-रूखा खाकर पेट भरने का इंतजाम हो जाता है। यदि जमीन नहीं रहेगी तब तो यह भी छिन जाएगा।
कुछ ने कहा- अरे डरो मत, सरकार मुआवजा देगी।
-पर कितने दिन चलेगा यह मुआवजा? छह महीने..साल भर..दो साल.. पर उसके बाद? खेत तो हमारे पुरखों के हैं। उन्होंने भी इसी जमीन में रोटियां उगाईं। हम भी उगा रहे। ये बची रहेंगी तो हमारे बच्चे भी अपना पेट भर सकेंगे। यह हमारे बच्चों को अनाथ करने की साजिश है.. हमारी ही जमीन हमसे छीनकर अनाज उगाएंगे और कल को हमी सोने के भाव गेहूं के दाने खरीदेंगे। यह किससे पूछकर हो रहा है? क्यों हो रहा है? कैसा विकास होगा? बिना हमारी राय लिए, बिना हमारी मरजी के यह कैसा विकास होगा? किससे लिए होगा? नहीं.. यह नहीं हो सकता..किसी तौर नहीं। और गांव के सब नौजवान लाठी-डंडा, गोली-कट्टा जो जिसके पास था, लेकर चल पड़े और पुलिस पर धावा बोल दिया। इतने लोगों को रोक पाना पुलिस के लिए संभव नहीं था। पुलिस और ग्रामीणों में भीषण संघर्ष हुआ। डीएम का सर फटा। कई पुलिस वालों को चोटें आईं। पुलिस ने लाठियां चलाईं, हवाई फायर किए और आंसू गैस के गोले दागे, लेकिन सब निष्प्रभावी। गांव वाले लाठी खाकर भी पीछे हटने को तैयार नहीं थे। पुलिस भीड़ को सम्हालने के सारे तरीके आजमा रही थी कि इतने में गांव वालों ने एक सिपाही को दबोच लिया और उसे पीट-पीट कर मार डाला। गांव वालों का यह उग्र रूप देख पुलिस और पैमाइश करने वाली टीम भाग खड़ी हुई।
गांव वालों को एक बार फिर लगा कि उन्होंने जमीन की लड़ाई जीत ली और अब उनकी जमीन उन्हीं की है।
लेकिन उन्हें शायद सत्ता की क्रूरता का अंदाजा नहीं था। हालांकि, गांव के बुजुर्गवार डरे-सहमे थे कि पुलिस वाले की मौत की कीमत जाने किस रूप में चुकानी पड़े। आखिरकार अंदेशा सच हुआ। आधी रात को गांव पर पुलिस ने धावा बोला। लोग घरों में, बाहर, आंगन, दालान जहां तहां सो रहे थे कि अचानक लाठियां बरसने लगीं। चारों ओर तूफान-सा उठ खड़ा हुआ। हर तरफ से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। जब तक लोग समझ पाते कि क्या हुआ, तब तक गांव भर से सैकड़ों लोग ट्रकों में भर कर थाने लाए जा चुके थे।
सुबह काफी वीभत्स हुई। तमाम लोग यहां वहां पड़े, कुछ के हाथ टूटे, कुछ के पांव टूटे, किसी का सिर फूटा, कई बेहोशी की हालत में हैं लेकिन उन्हें अस्पताल की जगह घर में ही छुपा लिया गया है। चारों तरफ सन्नाटा छा गया है। दरवाजों में जुंबिश तक नहीं हो रही है। वे ऐसे बंद हो गए हैं जैसे समय ठहर गया हो। परिवार का कौन सदस्य कहां है किसी को नहीं पता। कोई भाग गया कोई छुप गया या जाने क्या हुआ, किसे पता! अगर कुछ दिख रहा है तो गांव की गलियों में गश्त लगाती पुलिस और उनसे बातचीत करते कुछ मीडियाकर्मी। वे कहीं से भी मसालेदार सनसनी तैयार के लिए बेताब हैं। वे पुलिस की बताई बातों का चटनीकरण कर करके अपने अपने स्टूडियो में भेज रहे हैं।
सुबह पुलिस ने कुछ लाशों को इकटटा किया और लकड़ी-कंडों की मदद से उन्हें जला दिया। कितने लोग जलाए गए, ठीक ठीक तो पता नहीं, मगर गांव के बाइस लोग गायब हैं। क्या सारे मार कर जला दिए गए?
यहीं से कहानी में राजनीतिक दलों और नेताओं का प्रत्यक्ष प्रवेश दर्ज हुआ। सत्ता और जनता के संघर्ष में राजनीति अपनी संभावनाएं तलाशने कूद पड़ी। दिन जैसे-जैसे चढ़ा, वैसे-वैसे यह खबर गांव के बाहर तुड़े-मुड़े रूप में आनी शुरू हुई। सभी बड़ी पार्टियों के नेता, युवराज-राजे राजकुमार पहुंचे और गांव के दो-चार किलोमीटर दूर से ही पुलिस को गिरफ्तारी देकर लौट आए। टीवी चैनलों और अखबारों में अपने को किसान हितैषी दिखाने की होड़ लग गई। कुछ ने यात्राएं आयोजित कीं, कुछ ने आंसू बहाए, कुछ ने किसानों के लिए प्राण देने की कसम खाई।
घटना की तफ्तीश के आदेश दिए गए।
क्या हुआ था? पुलिस ने गोली चलाई और दस ग्रामीण मरे। नहीं-नहीं, बीस मरे। बाइस मरे, कई लापता हैं। पुलिस ने गांव वालों पर बड़ा जुलम किया...
कौन कहता है जी? कोई ग्रामीण तो कुछ कह ही नहीं रहा, दिल्ली के लोग क्या जानें? नहीं, यह सब झूठ है। सिर्फ दो पुलिस वाले मरे। गांव वालों ने मारा। नहीं कोई नहीं मरा। कुछ नहीं हुआ।
गांव के बाइस लोग गायब हैं। कौन जाने कहां गए! मानवाधिकार वाले कह रहे हैं पुलिस की गोलियों से मारे गए हैं और पुलिस ने लाशों को खह-बह कर दिया है। पुलिस कह रही है गांव वाले नौटंकी कर रहे हैं, मानवाधिकार वालों को उनके कहे में नहीं आना चाहिए। गांव वाले खामोश हैं। ज्यादातर लोग कुछ भी पूछने पर या तो चुप रहते हैं या बस रोने लगते हैं।
औरतों के जिस्म पर डंडों के निशान हैं। कइयों के हाथ पांव पुलिस की लाठी से टूट गए हैं और वे अब तक बिस्तर पर हैं। गांव का शायद ही कोई व्यक्ति बचा हो, जिसने पुलिस की लाठी न खाई हो।
और बलात्कार? वह तो पुलिसया कार्रवाई का अनिवार्य हिस्सा है। जहां-जहां जल, जंगल, जमीन का संघर्ष है, वहां-वहां बलात्कार होता ही है। स्त्री की अपनी अलग लड़ाई है, देह बचाने की, जो जल, जंगल, जमीन की लड़ाई के समानांतर चलती रहती है, जैसे देह ही उसकी जमीन हो, वही उसका साम्राज्य हो, जिसकी उसे रक्षा करनी है। यहां भी आठ औरतों का बलात्कार हुआ है।
उफ्फ! इतनी घिनौनी बात कैसे कह सकते हैं आप बिना किसी सबूत के..? किसने देखा, कब देखा, किसने किया? सब सियासत है। झूठ है। यदि बलात्कार होता तो कोई भुक्तभोगी भी तो होता! है कोई कहने वाला कि हां, मेरा बलात्कार हुआ है?
-नहीं, हमें नहीं कहना। बार-बार का बलात्कार हमें मंजूर नहीं। कह ही देंगे तो क्या हो जाएगा? जिसने कहा क्या उसे न्याय मिल गया? हमें कुछ नहीं हुआ है। मानवाधिकार कार्यकर्ता गांव गए और लौट कर कहा- नहीं, कोई बलात्कार नहीं हुआ। हुआ होता तो कोई तो कहता कि हां, हमारा बलात्कार हुआ है। कुछ दिनों तलक ऐसी ही झौं-झौं चैं-चैं होती रही और फिर सब शांत।
घटना के दिन ही अनुज गांव आया, लेकिन गांव के चारों तरफ पुलिस ही पुलिस.. उसे गांव में नहीं घुसने दिया गया। वह गांव के इर्द-गिर्द मंडराता रहा और फिर वापस दिल्ली लौट गया। घर पर किसी से बात नहीं हुई। गांव में भी किसी से नहीं। जिस किसी के भी पास मोबाइल है, वह बंद है। आखिर ऐसा क्या है? क्या लोग जरूरत से ज्यादा डर गए या वाकई स्थिति ऐसी है? चार दिन बाद मसला कुछ शांत हुआ तो अनुज घर गया।
अफवाहों से वह काफी डर गया था। घर पहुंच सबको सलामत देखा तो जान में जान आई। घर का कोई व्यक्ति मरा नहीं था। बस उसके पिताजी को हाथ में चोटें आई थीं, जिसमें वे नियम से हल्दी और सरसों का तेल बांध रहे थे।
जब रात को पुलिस ने धावा बोला तो अनुज के पिता सो रहे थे। पैर पर अचानक जोर की लाठी पड़ी तो चिल्लाते हुए तिलमिलाकर उठ बैठे। पुलिस वालों ने उन्हें पीटना शुरू कर दिया। चार-छह लाठियां ही पड़ी थीं कि वे भागकर कुएं में कूद गए और रात के पिछले पहर निकले, जब शोर-शराबा कुछ शांत हो गया। तब तक वे कुएं में ही छाती भर पानी में खड़े रहे थे। मां ने बताया- बाहर चिल्लाने की आवाज सुनकर जैसे ही दरवाजा खोला कि एक पुलिस वाला उन्हें धकेलते हुए अंदर घुस आया। वे चिल्लाने लगीं तो उसने एक हाथ से बाल पकड़ा और दूसरे से मुंह दबा कर बोला- ज्यादा चिल्ल-पों की तो यह डंडा देख रही हो न, पूरा अंदर कर दूंगा। वे डर के मारे सहम कर चुपचाप खड़ी हो गईं। तीन पुलिस वाले और घर में घुस आए। पूरे गांव से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आसमान तक उठ रही थीं। दोनों बड़ी लड़कियां नीलम और संध्या ने भी शोरगुल सुना तो दरवाजा खोलकर अपने कमरे से आंगन में आ गईं। वे मां के साथ बदसलूकी कर रहे थे। हल्की रोशनी के बावजूद पुलिस वालों ने उन्हें देख लिया। पुलिसवालों में से एक ने मां का गाल मरोड़ते कहा-अबे छोड़ो इसे... क्या बुढि़या पकड़ रखी है...। असली माल तो उधर है। वे उनकी तरफ बढ़े तो दोनों झट कमरे में भाग गईं और दरवाजा बंद कर लिया। पुलिस वाले लात मार मार कर दरवाजे को धक्का दे रहे थे, साथ में गालियां भी। दोनों कमरे में खड़ी उठता गिरता दरवाजा देख रही थीं। तब तक बाहर जोर का हल्ला हुआ और वे सभी पुलिस वाले घर से बाहर निकल गए।
तब तक अचानक मां चिल्लाई- अरे, कविता...कविता कहां है?
उसका कमरा घर में सबसे बाहर की ओर बरामदे से लगा था। कहीं उसके साथ तो कुछ नहीं हुआ.. मां भागी-भागी बाहर आई तो देखा कविता के कमरे का दरवाजा खुला है और वह बिस्तर पर स्तब्ध बैठी है। बाल बुरी तरह बिखर गए हैं। उसके चेहरे पर खरोंच के निशान हैं। गालों पर खून सने आंसुओं के धब्बे नुमायां हो रहे हैं। उसकी सूरत देख मां घबरा उठी- क्या हुआ.. बेटी क्या हुआ रे... उन्होंने कुछ किया तो नहीं... ये गाल पर खरोंच...ये खून... उन लोगों ने क्या किया... बिटिया क्या हुआ। मां ने उसका चेहरा अपने हाथों में ले झिंझोड़ा- क्या हुआ कविता... बताओ न बिटिया.. इस पर बस उसने न में सर हिला दिया। तब तक पीछे से बड़ी लड़की आकर बोली- मां, पापा कहां हैं? वे अपने बिस्तर पर नहीं हैं। बाहर कहीं दिख भी नहीं रहे। वे सभी घबरा कर बाहर की ओर भागीं, लेकिन कुछ पुलिस वालों को आता देख वापस घर में आ गईं और दरवाजा बंद कर लिया।
कविता उस दिन से खामोश हो गई। उसकी सूरत ऐसे हो गई जैसे बस्ती उजड़ जाने के बाद सूना सा ठीहा बचता है, जो गवाही देता है कि यहां कभी बस्ती आबाद हुआ करती थी। मां उसे देखतीं तो उनका भीतर चीत्कार कर उठता। पर कर क्या सकती थीं। मन ही मन छटपटाकर रह जातीं।
एक दिन अनुज घर पहुंचा तो किसी के रोने की आवाज सुनी। वह जाकर कमरे के बाहर चुपचाप खड़ा हो गया। कविता बुरी तरह रो रही थी और मां उसे समझा रहीं थीं- कोई बात नहीं बेटी, सब्र कर। तूने तो कोई गलत नहीं काम नहीं किया है न! भगवान सब देखता है। वह न्याय करेगा। तुझ पर किसी ने पाप किया तो उसकी वजह से तू क्यों घुट-घुट कर मर रही है। मेरी बिटिया! अब उबर जाओ उससे। उन्होंने मुझे भी तो भला-बुरा कहा था न! बाल पकड़ कर मुंह साध लिया था। कैसी भद्दी गालियां दी थीं तो क्या करूं मेरी बच्ची? हम छोटे लोग हैं। हम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते?
कविता जोर से चीखी- क्यों नहीं बिगाड़ सकते..? क्यों किया उन्होंने ऐसा? किसके कहने पर किया? कौन होता है कोई मुझे छूने वाला? कौन होता है कोई किसी के घर में घुस कर किसी की अस्मत लूटने वाला...?
- इसका जवाब तो तुझे इस दुनिया में कभी नहीं मिल पाएगा बेटी...
- तो मैं नहीं रह सकती ऐसी दुनिया में...मुझे घिन आती है ऐसी दुनिया पर...पाखंडी...हैवान...
मां ने उसका चेहरा अपनी गोद में समेट लिया। दोनों ही फूट फूट कर रो रही थीं। मां उसे समझा रहीं थीं या किसी ईश्वर से शिकायत कर रही थीं- हम क्या करें? किससे कहें जाकर? बस रो कर अपने मन का गुबार निकाल सकते हैं। क्या कहने जाएं कि पूरे थाने ने आकर हमारा बलात्कार किया? कौन सुनेगा? ये दुनिया का पहला बलात्कार तो है नहीं। जहां-जहां हो चुका है वहां किसे न्याय मिला?
मां कहती रहीं- वह देखो रामू चाचा की बिटिया पूनम, गुडि़या, राधा... वो विकास की बीवी.... बेचारी को अभी पंद्रह दिन आए हुआ था, उसे भी नहीं छोड़ा जानवरों ने.. कौन सुनने वाला है? इस नक्कारखाने में हमारी कौन सुनेगा? मैं तेरा तमाशा नहीं बनाना चाहती मेरी बच्ची...।  
कविता भरे गले से चिल्लाई- मैं ऐसी दुनिया में नहीं जीना चाहती मां... वे आपस में गुंथी हुई रोती रहीं और अनुज आंखों की नमी आंखों में दबा कर चुपचाप घर से बाहर चला गया।

जमीन का मुआवजा बंट गया। मालियत के हिसाब से सबको पैसे मिल गए। गांव अब ऐसा दिखने लगा है जैसे गरीबों की बस्ती में आग लगने के बाद मिटटी की दीवारों के उदास खंडहर खड़े रहते हैं। चेहरों पर मुर्दनी छा गई है। जिधर देखो उधर ही एक उदास झुंड फुसफुसा रहा है। जमीन जाने का दुख बेटे के मर जाने के दुख से कुछ कम होता है क्या भला! यहां तो कई लोगों के साथ दोनों हुआ है। यह थोपा हुआ मुआवजा मिले न मिले, क्या फर्क पड़ता है? कितने दिन खाएंगे यह मुआवजा? क्या मुआवजे में मिले पैसे जीवन भर पेट पालने के लिए अनाज देते रहेंगे? लोगों के होटों पर गालियां और माथे पर गुस्से की लकीरें तीखी हो रही थीं- हमारे घरों में रोटी नहीं होती तब तो कोई हरामी एक चुटकी आटा देने नहीं आता। अरबपतियों को जमीन चाहिए तो हमारी गर्दन क्यों उतारी जा रही है? हमें क्यों उजाड़ा जा रहा है।
गांव वालों के पास अब जख्म सहलाने के सिवा कोई चारा नहीं है।

कुछ महीने बाद सब हल्ला गुल्ला खत्म हो गया। नए नए रैकेट और घोटालों का खुलासा हुआ, नेता, मीडिया और सभ्य समाज सभी उसमें मशगूल हो गए। इधर, गांव वालों की अपनी मुसीबतों से दो-दो हाथ शुरू हुई। मुआवजे में, जिसकी जितनी जमीन गई थी, उसको उसके मुताबिक पैसा मिला। अनुज की कुल पुश्तैनी जमीन चली गई और मुआवजे में तीस लाख रुपये आये। परेशान घर वालों को अनुज समझाता रहता कि कोई बात नहीं, जमीन गयी पर तीस लाख रुपये आ गये हैं। इसी में कुछ न कुछ ऐसा कर लेंगे कि जीविका चलती रहेगी। जो होना था वह तो हो ही गया।
लोग करते भी क्या? रो-धो कर सब चुप हो गये और जिंदगी आगे बढ़ाने की जद्दोजहद शुरू हुई।
अनुज अपने स्वभाव के मुताबिक भविष्य की योजना में जुट गया। अब यही तीस लाख रुपये पूरे परिवार की संपत्ति है। इसी में घर भी चलाना है और जमा-पूंजी भी बचाए रखनी है। किसी की कोई नौकरी नहीं। कोई और सहारा नहीं। आमदनी को कोई और जरिया नहीं। इन्हीं खेतों के भरोसे उसने नौकरी छोड़ी थी और अब वे नहीं रहे। भविष्य की योजना नये सिरे से बनानी होगी।
अनुज ने किराये पर चलाने के लिए आठ लाख में एक गाड़ी खरीद ली और पांच लाख रुपये पूंजी लगाकर थोक में खाद्यान्न का व्यापार शुरू किया। दोनों धंधे चल निकले और कुछ दिन तो खूब आमदनी हुई। मगर नियति उसके साथ जैसे खेल खेल रही थी। अभी मात्र दो महीने बीते थे कि गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। गाड़ी में सवार लोगों में से दो की मौत हो गई। कुछ बुरी तरह घायल हुए, जिसमें अनुज के पिता भी थे। उनका एक पांव दबकर कई जगह से टूट गया, जिसे अंततः घुटने से काटना पड़ा। कुछ दिनों के लिए उनकी स्मिृति चली गई। एक पांव गंवा कर उन्हें ठीक होने में छह-सात महीने लग गए। मुआवजे में मिले पैसे में से दस लाख उनके इलाज में लग गए। परिवार की रोजी-रोटी चलाने के लिए खरीदी गई गाड़ी मलबे में बदल गई। उसे बनवाने का मतलब था उतना पैसा फिर खर्चना जितने में वह खरीदी गई थी। उसे खींच कर एक किनारे लगा दिया गया।
घर की हालत देख कर अनुज को डर लगने लगा। हालांकि, वह  अपना धंधा संभाल ले जाने कोशिश में जी जान से जुटा रहा,।
गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए वह पहली बार जुआ सम्हालने वाले उस बैल की तरह तैयार था, जिसे अनुभव भले न हो, पर वह बेहद उत्साहित रहता है। पिता के एक्सीडेंट के बाद घर की जिम्मेदारियां उसी पर आ टिकीं तो वह सब कुछ सम्हाल लेने की कोशिश में लग गया।
एक दिन मां ने आ कर कहा- जो पैसे मुआवजे में मिले हैं उन्हें छोड़कर हमारे पास कुछ नहीं है। दोनों बेटियों को जैसे-तैसे ठिकाने लगाना है। यह काम सबसे पहले करो, वरना सब पैसे कहीं इधर-उधर खत्म हो गए तो क्या होगा?
साल दो साल पहले मां ने यह बात कही होती तो शायद अनुज मां को डांट देता कि जैसे-तैसे ठिकाने क्या लगाना? लेकिन आज वह मन मसोस कर रह गया। सही ही तो है। जो भी उसकी बहनों से शादी करेगा उसे इस बात से क्या मतलब कि उस पर क्या गुजर रही है? इस कड़वी सच्चाई को चाह कर भी वह कहां नकार सकता है कि जीवन में सबसे नजदीकी रिश्ते भी पैसे की बदौलत ही तय होते हैं।
अनुज ने साल ही भर में नीलम और संध्या की शादी कर दी। लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे सब समस्याएं हल हो गईं। अनुज का परिवार समस्याओं के समंदर में ऐसी भंवरों में घिर चुका था कि जहां से किनारा मिल पाना संभव नहीं रह जाता। दोनों बहनों की जिम्मेदारी सर से उतरी तो मां बीमार पड़ गईं। मां की बीमारी तो जैसे बचे हुए पैसे लीलने ही आई थी, सो वह लील गई। मुआवजे में मिले सारे पैसे खत्म हो गए, उसके बाद मां भी।
अनुज का अपना धंधा फिर भी चल रहा था जिससे घर का नोन-तेल चल जा रहा था। अब घर में बचे एक अपंग बाप, गुमसुम सी एक बहन और अनुज। दोनों बहनें अब कभी कभी आने लगीं। घर की ऐसी छीछालेदर देख कर अनुज का भी सारा उत्साह जैसे मर गया। अब वह भी बुझा-बुझा रहने लगा। उसकी अपनी कमर्ठता उसे प्रोत्साहित करती तो परिस्थियां उसे हतोत्साहित करतीं। फिर भी वह एक बहादुर योद्धा की तरह डटा था, यह जानते हुए भी कि वह हार रहा है।
घर के बाहर द्वार से लगा बैठकनुमा एक कमरा था। पिता उसी में पड़े रहते थे। एक दिन अनुज उनसे मशविरा कर रहा था कि कविता की शादी का क्या करें? घर में वह अकेली रहती है। मां नहीं रहीं, बहनें भी नहीं रहीं, वह अजीब होती जा रही है। वह कुछ बोलती नहीं। कभी हंसती भी नहीं। शादी कर देने से हो सकता है कि घर बार में मशगूल हो जाने से उसकी हालत कुछ सुधर जाए। पर कैसे होगा, पैसा कहां से आएगा, समझ नहीं आता। पिता ने कहा- अभी रुक जाओ, अपना काम-धंधा मेहनत करके सुधारो, न होगा तो घर के पीछे वाली जमीन करीब दो बीघे के आसपास है। इसे बेच देंगे तो बिटिया की शादी आराम से निपट जाएगी। चिंता मत करो। इतना तो ईश्वर ने दिया ही है कि मरने से पहले बेटियां ब्याह दूं।
चाय लेकर जा रही कविता दरवाजे पर पहुंची तो आवाज सुन ठिठक गई। उसने बाहर खड़ी होकर सारी बातें सुनीं और चाय लिए लौट आई। वह भाई से छुप कर देर तक रोती रही- तो क्या अभी भी इस घर की तबाही में कुछ कमी रह गई है जो अब मेरी वजह से पूरी हो जाएगी? घर द्वार भी बेचना पड़ेगा? नहीं, मैं यह नहीं होने दूंगी। कतई नहीं। वह स्तब्ध-सी देर रात तक जागती रही, जैसे मंथन कर रही हो कि उसके पास क्या-क्या विकल्प हैं।

अनुज अगले दिन सुबह-सुबह काम पर जाने को तैयार हुआ। कविता ने उसे खाना खाने को कहा तो बोला कि सुबह-सुबह खाने की इच्छा नहीं है। इस पर कविता ने टिफिन पैक कर दिया। टिफिन थामते हुए अनुज ने देखा कि कविता उसे अपलक देख रही है। उसे याद नहीं आया कि इससे पहले कब दोनों ने निगाह मिलाकर एक-दूसरे को देखा था। उसकी आंखों में अजीब तरह की चमक थी। उसके चेहरे की कांति उसे और खूबसूरत बना रही थी। अनुज को कुछ आश्चर्य हुआ और खुशी भी। वह भीतर ही भीतर खुश हुआ कि शायद वह धीरे-धीरे सामान्य हो रही हो। वह धीरे से मुस्कराया और जवाब में कविता भी मुस्करा दी। अनुज का मन भर आया। यह मुस्कान कितने दिन बाद लौटी है! उसने टिफिन थाम कर बैग में रखा और घर से निकल गया।
दोपहर के समय जाने उसे कैसा महसूस हुआ और वह अचानक काम छोड़ घर के लिए चल पड़ा। उसने सोचा, आज कविता जरा अच्छी मनःस्थिति में दिख रही थी। चलेंगे उससे खूब सारी बातें करेंगे। उसके पास थोड़ा समय बिताएंगे। इसी तरह सिर धुनते-धुनते वह घर पहुंचा और सीधे कविता के कमरे में की ओर चलता चला गया। दहलीज लांघते ही वह जड़ हो गया। कविता पंखे से लटकी हुई थी। उसकी जबान बाहर आ गई थी। मुंह से निकली झाग पर दो-एक मक्खियां भिनभिना रही थीं। नीचे बिस्तर पर डायरी खुली हुई रखी थी। उसने अपने सर पर पहाड़ जितना वजन महसूस किया और लड़खड़ाता हुआ जमीन पर गिर गया। वह निस्तब्ध कभी डायरी तो कभी रस्सी से झूलती कविता को देखता रहा।
जरा होश सम्हले तो आगे बढ़कर लरजते हाथों से उसने डायरी खींच ली और पढ़ने लगा।

प्रिय अनुज भैया,
              दो साल पहले गांव में जो हमला हुआ था, वह गांव वालों पर पुलिस बर्बरता भर नहीं थी। वह सिर्फ सत्ता और आम जनता का संघर्ष नहीं था। वह बहुत कुछ था और सबसे पहले वह पुरुष समाज का स्त्री की अस्मिता पर हमला था। आपको कुछ बताना नहीं चाहती थी, पर मैं नहीं चाहती कि मैं भी उन पिछली पीढि़यों की स्त्रियों की तरह चुपचाप अपनी बलि स्वीकार कर लूं...। आपने मां से बहनों से या गांव वालों से सब सुना ही होगा। देश भर में डुग्गी पीट पीटकर हमारी अस्मत का तमाशा बनाया गया। बस उन बहरे कानों तक आवाज नहीं गई, जिनमें जानी चाहिए थी। उस रात मेरे और इस गांव की कई बहनों के भीतर की स्त्री कुचल दी गई। यह कोई पहली बार तो नहीं था, पर हां, देह का शिकार पहली बार हुआ। उसके बाद से मैं यह चेतना खो चुकी हूं कि मुझे क्या करना चाहिए। समाज में उपेक्षित और बलत्कृत अस्तित्व वाली चलती-फिरती लाशें कर भी क्या सकती हैं! हमारी भाषा सुनने-समझने का सलीका अभी इस समाज को नहीं आया है।
सत्ता के पांव तमाम लहू से सीझ कर मोटे हो चुके हैं, इसलिए वे एक गांव को बड़ी आसानी से कुचल सकते थे, सो उन्होंने कुचल दिया। स्त्री की अस्मिता कुचली गई और मैं अकेली नहीं थी। नौ बलात्कार और हुए थे गांव में। कइयों को नोच कर छोड़ दिया गया था। मां भी उनमें एक थीं। सियासत के नक्कारखाने में सब चीखें दब कर रह गईं। एक भरा-पूरा गांव उजड़ गया। यह घर भी उसका अपवाद नहीं। आपके भीतर एक अजब सी उमंग थी, आपकी बातों में एक प्रेरणास्पद खुद्दारी हुआ करती थी, वह सब आपसे छीन लिया गया है। अब आप सिर्फ एक उजाड़ दी गई दुनिया को बसाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। आपके कंधे का सबसे वजनदार बोझ मैं हूं। इसे हल्का कर रही हूं। यह मत सोचना कि मैं ऐसा अपराधबोध में कर रही हूं। मेरे प्रिय भाई! मैं बुज़दिल नहीं हूं। मैं बड़ साहस से कह रही हूं कि मैं एक स्त्री-विरोधी दुनिया में रहने से इनकार करती हूं। मैं इसका बहिष्कार कर रही हूं।
मैं जानती हूं कि तुम उन सारे मूल्यों के लिए संघर्ष कर सकते हो, जो मेरे या किसी और स्त्री के लिए इस दुनिया में रहने के लिए जरूरी हैं। यदि कुछ न कर सको तो इतना करना कि मेरी इस आवाज को हवा दे देना। मेरी यह चीख विश्व-स्त्री की चीख है, जो अब किसी भी चहारदीवारी से ऊंची हो चुकी है। आप साहसी हैं इसलिए मैं उम्मीद करती हूं कि आप मेरी मौत का मातम मनाने की जगह मेरे दागदार आंचल को सबसे पवित्र परचम में बदलने का यत्न करेंगे, ताकि आने वाली पीढि़यों की स्त्रियां इसे थाम कर आगे बढ़ें और अपनी मुक्ति का ऐलान कर सकें।

मेरे शब्द तुम्हें आत्मबल देंगे। अंतिम स्नेह के साथ-

आपकी लाडली बहन
कविता

अनुज ने गांव वालों के लाख समझाने के बाद भी कविता का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया। वह कविता की लाश के साथ गांव के पंचायत भवन के सामने धरने पर बैठा। पहले गांव वाले इसे उसकी मूर्खतापूर्ण हुज्जत कहते रहे। लेकिन अनुज ने कहा-यह आत्महत्या नहीं है। यह हत्या है। न्याय चाहिए। अन्याय सहने की सीमा खत्म हो चुकी है। उसके नवजवान दोस्त और गांव की कुछ औरतें भी उसके साथ धरने पर बैठीं। आखिरकार एक-एक कर पूरे गांव के लोग इकट्ठा हो गए। थोड़ी देर में मीडियाकर्मियों का हुजूम आ गया। उसने भीड़ के सामने कविता का सुसाइड नोट पढ़ा। अगले कुछ मिनट में टीवी चैनलों पर कविता का सुसाइड नोट पढ़ते अनुज की आवाज गूंजने लगी।
देश की अवाम को एक स्त्री की चीख पर यकीन हुआ। उसने गुस्से से सत्ता के सिंहासन को घूरा तो सिंहासन हिल उठा। तुरंत प्रसाशन सक्रिय हो उठा। पुलिस आ गई। गांव वालों ने खदेड़ दिया। भीड़ का मर्म भांपते हुए पुलिस वहां से दफा हो गई।
सारी रात गांव वाले बैठे रहे। गांव वालों की चीत्कार चैनलों के माध्यम से देश भर में गूंज रही थी। इसे नजरअंदाज कर पाना मुश्किल नहीं रह गया।
सुबह हुई। कविता की हत्या के मातम में डूबी सुबह। एक गांव की आंखों में भरे अंगारे शायद सूरज में और ज्यादा आग भर रहे थे। आज का सूरज ज्यादा सुर्ख था। यह सूरज रोज वाले सूरज से अलग था।
दिन चढ़ते ही मुख्यमंत्री ने गांव का दौरा किया। वे हाथ जोड़े गांव में दाखिल हुए। वे माफी मांगते हुए आदमी-आदमी से उलाहना सुनते, उन्हें न्याय का आश्वासन देते गांव में दाखिले हुए। वे धरना स्थल पर पहुंचे और अनुज के पास जा खड़े हुए। उनके साथ भारी संख्या में पुलिस फोर्स थी। किसी भी तरह के बवाल को काबू करने के लिए। उनके पहुंचते ही अनुज ने कहा- यह पुलिस किसलिए लाए हैं आप। इन्हें पहले गांव से बाहर कीजिए। एक बार पुलिस आई थी। अंजाम देख लिया आपने। इन्हें बाहर कीजिए गांव से। फिर आपसे कोई बात होगी। मुख्यमंत्री ने उसे अनसुना करते हुए गांव वालों से मुखातिब हो भाषण की मुद्रा में आ गए। उन्होंने लोगों की ओर हाथ उठाकर संबोधित करते हुए कहा- आत्मीय भाइयों और बहनों, हमें दुख है कि...
अनुज ने बीच में टोक दिया आप यह सब मत कीजिए... सुननी है तो हमारी बात सुनिए वरना चले जाइए यहां से... मैं कह रहा हूं फोर्स हटाइए यहां से...
मुख्यमंत्री ने थोड़ा ठिठक कर आगे कहना शुरू किया- ...आपको न्याय दिलाना हमारा काम है और कानून व्यवस्था बनाए रखना भी हमारा काम है। हम पूरे मामले की सीआईडी जांच कराएंगे। अनुज ने फिर बीच में टोका- पहले आप मेरी बात सुनिए.....
नेताजी कहते गए- दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम आप सभी को आश्वासन दे......
इतने में अनुज ने लाश के सिरहाने फूल, अगरबत्ती आदि के बीच दबा चाकू उठाया और नेताजी के गले में पार कर दिया। वह बेतहाशा उनपर पिल पड़ा। एक...दो...तीन...चार...और जब तक लोग कुछ समझ पाते तब तक नेता जी लड़खड़ाकर जमीन पर गिरने लगे। इतने में नेताजी के सुरक्षागार्ड ने अनुज पर अपनी एके-47 खाली कर दी।
सुरक्षा गार्डों ने नेता जी को उठा कर गाड़ी में बिठाया, लेकिन अस्पताल पहुंचते-पहुंचते देर हो चुकी थी। गांव वालों ने एक साथ कविता और अनुज की चिता सजाई।
मुख्यमंत्री की हत्या के बाद प्रदेश में तुरंत राष्ट्रपति शासन लगाया गया और प्रधानमंत्री ने हत्याकांड सहित पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच की घोषणा कर दी। जांच जारी है और जब तक पूरी न हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।
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