Friday, July 26, 2013

मैं तिनके सा

मैंने कहा- मैं तुम्‍हें प्‍यार करता हूं।
उसने कहा- तुम बुद्धू हो।
मैंने कहा- तुम बहुत सुंदर हो।
उसने कहा- -तुम परिपक्‍व नहीं हो।
मैंने कहा- तुम्‍हारे बिना जी नहीं लगता।
उसने कहा-तुम बच्‍चे हो।
मैंने कहा- जिया नहीं जाता अब।
उसने कहा-तुम अधीर हो।
मैंने कहा- तुम्‍हारे सिवा कुछ अच्‍छा नहीं लगता।
उसने कहा-तुम्‍हारा स्‍वार्थ तुम पर हावी हो रहा है।
मैंने कहा- कुछ समझ नहीं आता।
उसने कहा-तुम्‍हारी आंखें बंद हो चुकी हैं।
मैंने कहा- मैं तिनके सा हूं। अपने पांवों में कहीं जगह दे दो।
उसने अपने पावों के पास देखने की बजाय दूर कहीं शोर सुना। वह आगे बढ़ गई। मैं उसके जूते में फंसकर उड़ा और दो कदम दूर झाडि़यों में फंस गया। 

Tuesday, July 2, 2013

दीवारें नहीं टूटीं

उसने कहा- मेरी लड़ाई खुद मुझसे है, तब तक, जब तक मैं सारी स्याहियों को जज्ब करने लायक दामन न
तराश लूं।
कैसी लड़ाई?
किसलिए?
औचित्य क्या है?
-यही तो साफ नहीं है। बस, यह जाहिर है कि लड़ना है। आत्म-परिष्कार के लिए एक युद्ध। शायद उम्र लग जाए। और यह भी हो सकता है कि इसका हासिल मुझे न मिल कर बाकी जमाने को मिले।

आंख खुली तो वह उठ कर बाहर आया। क्षितिज से उजाला फूट रहा था, जैसे चमड़े के कारखाने में से धुआं उठ रहा हो और आसपास की फिजा उसकी कालिख में सन गयी हो। वह बहुत देर तक बॉलकनी पर खड़ा चारों ओर देखता रहा। कहीं कुछ भी नहीं दिखा जिसे देख कर सुकून मिले। तीसरी मंजिल की बॉलकनी से चारों ओर देखते हुए ऐसा लगा कि जैसे वह किसी जंगल में आकर गिरा है और एक उंचे से दरख्त पर अटक गया है। दरख्त में न फूल हैं, न पत्तियां है। सिर्फ शाखें हैं और शाखों पर कांटें हैं। वह उन्हीं कांटों पर टिका है। उसकी उठती-गिरती सांसों में कांटे चुभ-चुभ जाते हैं और वह अपार पीड़ा से बिलबिला रहा है। अगर यह बीती सदी की किसी फिल्म का दृश्य होता, तो बैकग्राउंड में गाना बज रहा होता... हदे-निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है....। जहां तक निगाह जा पा रही थी, उसे धुंध ही धुंध ही दिखती है। खूब घना कांटों का जंगल।
उसने सोचा- क्या करूं? कहां जाऊं? कूद जाऊं यहां से? मरूंगा तो नहीं। हां, पूरा बदन छिल जाएगा जरूर। या ऊपर से नीचे गिरते वक्त मैं कांटों में फंस-फंस कर टुकड़े-टुकड़े बिखर जा जाऊंगा। लेकिन कूदने की जरूरत क्या है? हां, जरूरत है। जरूरत इसलिए कि मन में अथाह पीड़ा है और इतनी पीड़ा के साथ सिर्फ मरा जा सकता है, जिया नहीं जा सकता है।
पीड़ा क्यों है?
नहीं जानता, पर खुश रहने की कोई वजह भी तो नहीं है, इसलिए पीड़ा है, सिर्फ पीड़ा।
अरे पगले! सुबह-सुबह ये किस उलझन में फंस गया तू? देख, वह क्षितिज पर लाली छा गयी है। सूरज बस निकलने ही वाला है। दुनिया में यही समय तो सबसे शुभ होता है। रोज ही असंख्य आंखें तमाम-तमाम सपनों के साथ खुलती हैं और अपने-अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ती हैं।
हां, सही है। पर इसमें सुबह का क्या? वह तो आंखों और सपनों का जीवट है कि वे निराश सोते हैं और उत्साह से लबरेज हो फिर जाग जाते हैं। वे रक्तबीज हैं। वे मरते नहीं। वे मौत से परे हैं....। उनकी हर बंूद से एक नया सपना पैदा होता है.... उनका कोई बिगाड़ेगा क्या....।
इतने में सोच टूट गयी, जैसे हमेशा टूटती है। वह हंसा- सोच का टिका रहना कितना मुश्किल है!
अब तक काफी देर हो चुकी थी। रात का धुंधलका भी जा चुका था और सूरज उग रहा था- मलिन, फटा-फटा सा, बिखरा-बिखरा और अब खुद को इतना दीप्तिमान कर लेगा कि उसे देखा भी नहीं जाएगा। इसकी जगह कोई छोटा सा दिया होता तो उसके सहारे कुछ घड़ी कट सकती थी। इसे तो देखा ही नहीं जा सकता देर तक। इसके आने-जाने का कोई फर्क नहीं। मेरे लिए यह सुबह भी वैसी है, जैसी शाम गयी है। दिन भी वैसा जाएगा, जैसी रात गयी है। यदि मेरी पीड़ा बनी ही रहती है तो दिन हो या कि रात, मुझे क्या?
वह वापस कमरे में आ गया और फिर से बिस्तर पर लेट गया और चादर खींच ली। एकदम उतान लेटा हुआ चादर के भीतर-भीतर वह सोच रहा था कि यह सुबह वाकई कितनी खराब चीज है! रात भर कम-से-कम इतना सुकून था कि बेचैन मन से बिस्तर पर लेटा तो नींद आ गई और कुछ घंटे अपने को भूल गया....
...अरे हां, रात को मुझे नींद आयी। नींद यानी कुछ समय के लिए आदमी का करीब-करीब मुर्दा हो जाना, जो कि मैं कुछ घंटे लिए हो गया था। अपने को भूल गया था। अपने को भूलना कितना सुखद होता है! जरूरी भी। लेकिन रात वास्तव में कमाल की चीज है। वाह! रात वास्तव में....।
लेकिन मैं उसे सुखद क्यों कह रहा हूं? ठीक है कि कुछ घंटे मैं छटपटाया नहीं, तो चलो यूं कह लो कि मेरे लिए यह ठीक रही। उसका कारण हो सकता है कि मेरा पेट भरा हुआ था। मेरा बलात्कार भी नहीं हुआ था। मेरे साथ लूट भी नहीं हुई थी। क्या जो भूखे पेट सोया होगा, जो बलत्कृत हुआ होगा, जो लुटा होगा, उसके लिए भी यह रात इतनी ही सुखद रही होगी? वह तड़प उठा।
उसे मां याद आ गई। मां ने पिछले हफ्ते कहा था घर आने को। दो-एक दिन के लिए ही सही पर आ जाओ। लेकिन वह नहीं गया। ’’मां-बाप के पास जाने की फुरसत किसे है? जाएं भी तो करें क्या? बाप मुंह फुलाए रहेगा कि लड़का निकम्मा है क्योंकि बीस-बाइस बरस का हो गया है और अभी तक कहीं सरकारी बाबू नहीं हो पाया। और मां! वह तो हरदम रोती रहेगी। वह हरदम रोती रहती है। जब से होश संभाला है, देख रहा हूं कि वह रोती ही रहती है। मैं पैदा हुआ था तब का याद नहीं, पर यकीनन, वह तब भी रोई ही होगी। मेरे पैदा होने के पहले भी वह रोती रही होगी। उसे इतना तो समझ गया हूं कि दावे से कह सकता हूं-वह रोने के लिए ही बनी है। मैं कह सकता हूं कि उसके आंसू ही उसका जीवन हैं और मैं उस जीवन का कभी साथी नहीं बन सका। पर ये भी क्या बात हुई? हरदम रोते ही रहो। अरे जिससे आपको परेशानी है, उसका शमन करो, उसकी हत्या कर दो, खत्म कर दो सारे अवरोध और हंसो। मगर वह कहां मानती है? कहती है- इतने खतरनाक विचारों का आदमी मेरा बेटा नहीं हो सकता। अब जब वह खुद कह रही है कि मैं उसका बेटा नहीं तो मैं जाऊं क्यों उसके पास?...’’

सोच फिर टूट गई....।
उसने करवट बदली और अपने आप को कोसा- ‘‘यह मैं क्या-क्या सोचता रहता हूं। यह सब छोड़ो। वह मां है। बुलाती है तो जाना ही पड़ेगा। मां मैं आ रहा हूं। आ रहा हूं....बस, सारे काम जरा निपटा लूं फिर आता हूं...।’’
यह सिलसिला करीब दस सालों से चल रहा है। वह शायद रोज ही मां से वादे करता है कि वह जल्दी ही आएगा और रोज अपनी उलझनों में ऐसा व्यस्त हो जाता है कि घर जाने की योजना ही नहीं बन पाती। उसे समस्याओं का ऐसा अंबार दिखता है, जिसके आगे मां से मिलना बहुत छोटा और गैरजरूरी काम लगता है। हालांकि, मां के व्यवहार और बातों से लगता है कि मां सब बच्चों में उसे सबसे ज्यादा प्यार करती है। वह हमेशा उससे मिलने को छटपटाती रहती है। लेकिन उसे मां का इस तरह अधीर रहना अच्छा नहीं लगता।
-क्या रोज-रोज मिलना-जुलना? अरे! इतने सालों तक तो उसी के पास रहा हूं। अब अपना ही जीवन इतना भारी और खौफनाक हो गया है कि इससे वह दुखी ही होगी।

वह उठा तो दिन के तीन बज रहे थे। सोचते-सोचते जाने कब सो गया था, उसे पता भी नहीं चला। आंखें मीचते हुए उसने सिगरेट का डिब्बा उठाया और एक सिगरेट जला ली। उसने सोचा- यह धुआं भी क्या अजीब और अपरिहार्य चीज है, दुख की तरह पूरे जीवन साथ रहता है-जन्म से मृत्यु तक। धुएं के बारे में सोचते-सोचते वह सिगरेट का पूरा डब्बा खाली कर गया। दरवाजा बंद था और पूरे कमरे मंे धुआं-धुआं। ठीक ऐसे ही तो दिख रही थी आज की सुबह...। शाम भी ऐसी ही आएगी। बस धुआं... चारों ओर धुआं...।
वह बचपन से ही कुछ बातों को लेकर परेशान है और वह परेशानी अभी तक बनी हुई है। मसलन, सूरज का मन-मुआफिक रंग बदल लेना और आदमी का महज तमाशबीन होना। वह दो बातें इस जहान में बिल्कुल नहीं होने देना चाहता- एक यह कि चांद का आकार कभी छोटा न हो, और दूसरा यह कि कोई कभी आत्महत्या न करे। मगर यह दोनों बातें वह रोक नहीं पा रहा है। या यूं कह लो इसका शिकार खुद वह भी हुआ, जब उसकी प्रेमिका ने दीवारों से आजिज आकर आत्महत्या कर ली। वह दीवारें नहीं पसंद करती थी और उन्हें ही उसका नसीब बना दिया गया था। वह कहती थी-मेरा दम घुटता है। दीवारों को परे हटाओ और मुझे सांस लेने दो। दीवारों ने कहा-जितनी सांसें हम अता करें, वही तुम्हारा हक है। बाकी की आकांक्षाएं असंगत हैं। उसने विरोध किया और दीवारों की आगोश में ही खाक हो गई। दीवारें फिर भी रह गईं।
इन्हीं को ढहा देना उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

दीवारें इतनी बलवती कैसे हो गईं?

वह पहली बार जब गांव में लगने वाले मेले में उससे मिला तो दोनों में कोई बात नहीं हुई थी। बस, आंखों में ही कुछ कह गई थी। उसकी निगाहों में एक आह्वान था। दीवारें तब भी उसके साथ थीं, जो उसकी आवाज को नहीं रोक सकीं। लड़की ने आवाज दी-दीवारों से मुक्ति चाहिए। उसने जवाब दिया- मैं आपके साथ हूं, बाजुओं की ताकत बनकर। लड़ो, आत्मबल तुम्हारा, हुमस मेरी, बल मेरा। बाजू तुम्हारे, ताकत मेरी।
दोनों में एक मौन समझौता हो गया। दोनों ऐसे जुड़ गए जैसे कोई अपनी दोनों हथेलियों को आपस में भींच लेता है। वे चल पड़े। दीवारों से परे खुले खेत थे, खलिहान थे, सड़कें थीं, पार्क थे, बेहद जमीन थी, खुले आसमान थे। पर दीवारें साथ थीं... वे जन्म से साथ थीं।

इनसे मुक्ति का उपक्रम करना होगा। हम साथ हैं। करेंगे, वह सब जो करना पड़े। दो हथेलियां गुंथी हुई साथ-साथ चलने लगीं। लेकिन दीवारें भला इतनी उदार कब होने लगीं! वे और सिमट गईं। घेरा कसता गया।

दो मुलाकातों के बाद एक महीना बीत गया, वह नहीं दिखी। एक दिन उसे एक पत्र मिला। एक बच्चा लाकर दे गया। वह लड़की का चचेरा भाई था। उसके हाथ में एक चाॅकलेट था, जो उसके आधे मुंह में लिपट गया था। यह शायद पत्र पहुंचाने का मेहनताना था। वह दौड़ा हुआ आया और झट से उसे थमा दिया जैसे पहाड़ कंधे से उतार कर पटक दिया हो- यह लो, दीदी ने दिया है और भाग गया।
उसने पत्र खोला-
आकाश
उस दिन तुमसे मिलकर लौटी तो सबको पता चल गया था कि खेत में तुम मुझसे मिले थे। शायद पिताजी ने देख लिया था। तब से मुझे घर से बाहर कदम न रखने का कह दिया गया है। इस हिदायत के साथ कि अगर मैं घर से बाहर दरवाजे पर भी दिख गयी तो पांव काट लिए जाएंगे। लोग कितने कमजर्फ हैं। पांव कटने से किसी की यात्रा रुकी है भला। इन दीवारों में मेरा दम घुटता है। मेरी शादी की बातें चल रही हैं। मैंने मना किया और इस जुर्म में मां और पिताजी के हाथ दो-दो बार पिट चुकी हूं। वे लोग मुझे देखने आने वाले हैं। पहरे बढ़ गए हैं। हरदम कोई न कोई मेरे आसपास रहता है। खैर, तुम निश्चिन्त रहो। मुझे कोई कैद करके नहीं रख सकता। इस घर की रवायतों पर मेरा बस हो न हो, मेरी जान मेरी अपनी है। मैं उसकी मालकिन हूं। होगा वही जो मैं करूंगी। अगर यहां से निकल सकी तो यह देश छोड़ दूर निकल चलने के लिए तैयार रहना। अगर यह न हो सका तो मैं चिर यात्रा पर निकल जाउंगी। तुम अपनी दुनियादारी निपटाकर जब मौका मिले, आना। मैं इंतजार में रहूंगी। तुम खुद को कमजोर मत होने देना। इससे ज्यादा कुछ कह पाने का वक्त नहीं है। शेष मिलने पर... अगर मिल सके तो...

तुम्हारी
.....

आकाश किसी अनहोनी की आशंका से सिहर उठा।

तीन दिन गुजर गए उसने कोई संदेश नहीं भेजा। वह इंतजार करता रहा। उसके पत्रवाहक भाई की प्रतीक्षा करता रहा कि शायद कहीं दिख जाए तो खैरियत मालूम हो, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
वह सोच रहा था कि अगर किसी तरह वह एक बार उसे मिल जाए फिर दोनों ऐसे छूमंतर होंगे कि ईश्वर भी दोनों को खोज नहीं पाएगा।
उसे लेकर कहां जाएगा, कैसे रहेगा, क्या करेगा, इन्हीं बातों में सिर धुनते-धुनते पहली बार की मुलाकात उसके जेहन में ताजा हो गई।
बड़ी-बड़ी गोल आंखें। माथे पर नाखूनी का लंबा-पतला सा टीका लगा हुआ। छोटी सी उठी हुई नाक में पतले तार की नथनी। घुंघराले घने बालों में एक सादा सा रिबन। औसत कद काठी पर एक हरे रंग का सूट। कंधे पर आधी सरकी हुई ओढ़नी। आंख मिलाते ही उसकी आंखें भर आईं थीं। चेहरा लाल हो गया था। उन पनीली आंखों में एक तेज था। आत्मविश्वास था। जीवन जीने और प्रतिरोध करने का हौसला साफ झलक रहा था। नाम पूछने पर धीरे से बुदबुदाई थी- अंजू। जब तक सामने खड़ी रही, एक हाथ से दूसरे हाथ की उंगलियां तोड़ती रही और बस हां-हूं में जवाब देती रही। मुख्तसर सी मुलाकात करके चली गई थी। और चली ही गई....।

कोई तीन चार दिन गुजरे होंगे। आकाश दरवाजे के सामने जमीन पर माटी में ही पैर फैलाए बैठा था। सामने चटाई पर मां थोड़ा बाजरा सूखने को डाल गई थी। दाना थोड़ा था, चटाई उसके मुकाबले काफी लंबी चैड़ी। आकाश बार बार मुट्ठी में गेहूं भरता और फिर चटाई बिखेर देता। फिर बटोरता, फिर बिखेर देता। हल्का कुहासा था, कभी कभी सूरज थोड़ा सा झांकता, हल्की धूप झांकती और कुहासे में फिर से छुप जाती। अनायास गेहूं के दाने बटोरते-बिखेरते काफी समय गुजर गया। आकाश दानों से उलझा हुआ जाने किस सोच में डूबा था कि अचानक किसी के घबराए से पदचाप से उसका तंद्रा टूटी। बच्चा हाथ में चाॅकलेट लिए आया और आकाश के हाथ में एक कागज का आधा फटा तुड़ा मुड़ा सा टुकड़ा पकड़ाकर उसी वेग से लौट गया। आकाश ने इधर उधर देखा कि कोई देख न रहा हो और पत्र पढ़ने के जरूरी एकांत की तलाश में उठकर घर की एक तरफ चला गया। इंतजार के बावजूद आज जाने क्यांे उसे पत्र की आमद अच्छी नहीं लगी। उसने संभाल कर कागज का टुकड़ा सामने फैलाया। मात्र दो पंक्तियां थीं-
आकाश, आज मैं अपने सर पर लादे गए सारे बोझ से मुक्त हो रही हूं। आगे का रास्ता तुम्हें अकेले तय करना है। अपने लिए अच्छे रास्ते तलाशना। मैं चलती हूं। अलविदा...
आकाश को सांप सूंघ गया। अब क्या करे। क्या भाग कर उसके घर जाए और उसे उन दीवारों से हमेशा के लिए मुक्त करा ले... उसने कागज का टुकड़ा जेब में ठूंसा। कदम अंजू की घर की तरफ बढ़ चले। नहीं, यह नहीं हो सकता। मेरे रहते यह नहीं हो सकता। कदम और तेज हो गए। कलेजा मुंह तक आ गया-नहीं... नहीं... सुनो, तुम ऐसा नहीं करतीं। कोई भी दीवार इंसान के हौसलों से उंची नहीं हो सकती। एक छलांग मारो और इस पार आ जाओ, मैं इंतजार में हूं। फिर कोई नहीं पा सकेगा हमें... तुम ऐसा कतई मत करना। आकाश के घर से उसके घर तक पहुंचने में कोई पांच सात मिनट लगते थे। वह करीब पहुंचा तो अजीब चीख पुकार सुनकर ठिठक गया। अंजू के घर से अजब घबराहट भरी चीख बाहर आ रही थी। यह उसकी मां थी। जोर जोर से रो रही थी। अंजू जा चुकी थी।
वह उल्टे पांव लौट पड़ा। नहीं माना तुमने? मेरा कहा नहीं सुना तुमने? तुम इतनी बुजदिल हो गईं? यह तो नहीं होना था। अब....?
वह फफकते हुए खेतों की ओर बढ़ गया।

आकाश घंटों खेत में बैठा अंजू के बारे में सोचता रहा। कोई आदमी आत्महत्या कैसे कर सकता है? अनमोल जीवन को कोई इतनी आसानी से कैसे गवां सकता है? क्या परिस्थियां इतनी सशक्त हो सकती हैं कि आदमी उनसे हार जाए और पलायन का रास्ता चुन ले? लेकिन यह उसका विरोध भी तो हो सकता है। मौत का ख्याल कितना डरावना होता है, बावजूद इसके कोई मौत को गले लगा ले, अदम्य साहस भी तो है कि आपने अपने लिए सबसे डरावनी डगर चुन ली।

वह दो घड़ी रात बीते घर पहुंचा। दरवाजा खुला था, मां आंगन में पड़ी चारपाई पर गुमसुम बैठी थी। शायद उसी के इंतजार में। पहुंचते ही थोड़ा नाराज होती हुई बोली- कहां चले गए थे तुम? इतनी रात गए घर आ रहे हो, बता कर नहीं जा सकते थे। उसे झिड़कते हुए मां उसके लिए खाना ले आई। वह चुपचाप खाने लगा। खाना भीतर नहीं जा रहा था। वह पूरी ताकत से अंदर धकेल रहा था। मां से यह कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह खाना नहीं खा सकता। वह हजार सवाल करती, क्यों नहीं खाओगे? क्या खा कर आए हो? भूख क्यों नहीं है...वगैरह वगैरह।

वह चुपचाप निवालों से जूझ रहा था और मां उसे गांव में घटी आज की घटना के बारे में बता रही थी- अंजू ने फांसी लगा ली। वह दो दिन से बिस्तर से नहीं उठी थी। उसकी मां उसे खाना देने गई तो देखा वह छत से लटकी हुई है। मां सदमें में है। वह बार बार बेहोश हो जा रही है। सब बता रहे हैं कि वह किसी को चाहती थी, इसलिए फांसी लगा ली। बताओ, यह भी कोई चाहना हुआ? कैसे कैसे लड़के लड़कियां हैं आज के? पढ़ लिखकर सब अकारथ...
वह बीच में ही उठ गया- अब नहीं खाउंगा। उबकाई आ रही है। तबियत कुछ ठीक नहीं है...
मां ने दो-एक बार टोका, लेकिन सीधे घर से बाहर निकला और दालान में चला गया। ज्यादा न बोलने की आदत के कारण उसने मां को कोई जवाब नहीं देना पड़ा। यह भी नहीं कह सकता था कि जो हुआ, सब जानता हूं और कुछ हद तक मैं भी मर गया हूं। वह बेतरह चीखना चाहता था। इतना तेज कि उसकी आवाज पलायन कर गई अंजू तक पहुंच जाए। वह अपने बिस्तर पर आकर बैठ गया और बैठा रहा... सुबह तक।

कुछ समय बाद वह इलाहाबाद चला गया। उसे विश्वविद्यालय में दाखिला मिल गया था। विश्वविद्यालय पहुंचना उसके लिए बाकी युवाओं जैसा नहीं रहा। वह अंजू के साये से मुक्त नहीं हो सका। आकाश अकेला पड़ता गया। वह अपने व्यक्तित्व का विस्तार चाहता। वह कुछ करना चाहता। वह उन तारीकियों से लड़ना चाहता जिनमें अंजू खो गई, लेकिन अंत में वह हार जाता और उसी कमरे में उसे पनाह मिलती जिसमें करीब-करीब उसका दम घुटता। वह दिन भर इलाहाबाद की शांत चैड़ी सड़कों पर अकेला घूमता रहता। जैसे कि यहीं कहीं अंजू मिल जाएगी। संगम के तट पर, अकबर के किले में, सरस्वती घाट पर, कंपनी बाग में, भारद्वाज पार्क में, खुसरो बाग में, विश्वविद्यालय कैंपस में या किसी गली में। वह भीड़ में कभी पहुंचता तो बहुत तेजी से चारों ओर देखता। हर चेहरा उसे निराश-उतरा हुआ दिखता। हर ओर एक सुनसान सा मंजर, जहां न रहा जा सकता है और न किसी से बात की जा सकती है। अंत में निराश होकर वह लौटता और कमरे में बंद हो जाता... विह्वल... बेचैन...

उसे लगता कि इलाहाबाद एक सोया हुआ शहर है। यहां चारों ओर से इतने सारे युवा आते हैं और खामोश यहां से चले जाते हैं। यहां सबके कांधे पर एक गौरवशाली अतीत के सिवा कुछ नहीं है। यहां कुछ बदलता क्यों नहीं? यहां से कोई शुरुआत क्यों नहीं होती? यहां पर अब नए अध्याय क्यों नहीं लिखे जाते? उसने कोशिश शुरू की। वह कुछ युवा लेखकों को बटोरकर एक साप्ताहिक गोष्ठी आयोजित करने लगा, जिसमें दुनिया की तमाम दुश्वारियों पर बहस-मुबाहिसे होते। उनके उन्मूलन की योजनाएं बनतीं। युवा अपने जीवन लक्ष्यों पर चर्चाएं करते। वे विश्वविद्यालय में फैलती जड़ता को उखाड़ फेंकने की योजनाएं बनाते। वे परिसर में लागू होते आपातकाल के खिलाफ प्रस्ताव पारित करते। वे वहां तैनात बंदूकों के विरोध नारे लगाते और उन्हें परिसर से बाहर करने की मांग करते। वे अपनी कविताओं और कहानियों में एक यूटोपिया गढ़ते और उसे साकार करने के सपने देखते। आकाश को इन सबमें अपनी निराशाओं से थोड़ी राहत मिलती। वह सोचता कि मैं उन तमाम दीवारों को ध्वस्त करूंगा जिनसे लड़ते-लड़ते अंजू शहीद हो गई।
आकाश के जो कुछ नजदीकी साथी थे, उन्हीं में से एक थी काव्या। वह हिंदी की शोधछात्र थी और विश्वविद्यालय के हाॅस्टल में रहती थी। आकाश से उसकी गहरी दोस्ती हो गई थी। वह रिसर्च करने के बाद एक महिला संगठन बनाना चाहती थी ताकि महिलाओं के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न से लड़ सके। इस काम में उसने आकाश से भरपूर सहयोग का वादा लिया था। वह स्त्रियों के रहने लायक एक दुनिया का सपना देखती थी और उस दुनिया की तस्वीर वह कहानियों और कविताओं में उतारा करती थी। उसे आकाश की सारी कहानी पता थी और कहा करती थी कि अब इस तरह किसी और अंजू को मरने नहीं देना है।
काव्या के रिसर्च गाइड प्रोफेसर साहब काफी पहुंचे हुए आदमी थे। वे अध्यापक संघ में सक्रिय थे और विश्वविद्यालय प्रशासन में काफी पहुंच रखते थे। वे शोध परंपरा के मुताबिक, उससे अपने बहुत सारे व्यक्तिगत काम करवाते, जिससे वह त्रस्त रहती थी और जल्द ही अपना रिसर्च पूरा कर उनसे मुक्त हो जाना चाहती थी।
प्रोफेसर साहब ने एक रोज उसे अपने घर बुलाया। वहां से लौटने के बाद वह बहुत परेशान थी। वह अपनी रूम पार्टनर सहेली से लिपट कर खूब रोयी। बहुत कुरेदने पर बताया कि प्रोफेसर साहब ने उसके साथ जबरदस्ती की है और कहा है कि यदि वह इसके विरोध में कुछ करेगी तो उसे अपने रिसर्च से हाथ धोना पड़ेगा। सहेली देर तक उसे समझाती रही और सो गई।
अगली सुबह सहेली जागी तो देखा काव्या पंखे से लटकी हुई है।
आकाश ने अपने साथियों के खिलाफ मिलकर प्रोफेसर साहब के खिलाफ अनशन शुरू किया। तमाम विद्यार्थी उसके साथ आ गए और विश्वविद्यालय परिसर का कामकाज ठप हो गया। विश्वविद्यालय प्रशासन हरकत में आया और आकाश को साथियों सहित  पुलिस उठा ले गई। उसे दो दिन जेल में पीटा गया फिर छोड़ दिया गया। उसे व्यवस्था भंग करने के आरोप में विश्वविद्यालय से हमेशा के लिए निकाल दिया गया और मामला शांत हो गया।
उसने साथियों संग मिलकर काफी कोशिश की कि मामले में कोई कार्रवाई हो, प्रोफेसर साहब के खिलाफ जांच हो, उन्हें हटाया जाए, लेकिन कुछ नहीं हुआ। जो विद्यार्थी उसके पक्ष में आए थे वे सब अपने-अपने कामों में मशगूल हो गए। अब वह उनसे इस बारे में कुछ कहता तो वे उसकी हां में हां तो मिलाते, पर कुछ करने के नाम पर कन्नी काट जाते।
आकाश ने बहुत दिनों तक इस सिलसिले में कोशिश की और फिर चुप रह गया, लेकिन जब भी वह अकेला होता, उसे उस लड़की के ख्याल परेशान करते। उसे लगता कि प्रोफेसर ने उसकी आंखों के आगे काव्या का कत्ल किया, जैसे अंजू को मारा गया था और वह कुछ नहीं करता। वह कभी आईने के आगे खड़ा होता तो आईना उसे चिढ़ाता कि तुम दो दो हत्याओं के चश्मदीद हो। किस मुंह से खुद से आंख मिलाते हो। वह आईने के सामने से हट जाता। उसे रात को सपने आते कि तुम कायर हो, तुम किसी निर्दोष की हत्या पर चुप हो, तुम हत्या में शामिल हो। तुम हत्यारे हो...

इन्हीं उलझनों में उसे तीन साल गुजर गए और उसका एक दोस्त उसे दिल्ली ले आया।
दिल्ली एक चीखता हुआ घबराया, डरा-सहमा सा शहर। चैड़ी मगर बोझिल सड़कें। बेहद भीड़। बलत्कृत होती यतीम गलियां। चारों तरफ विचरती निराशाएं। निरी अकेली, उदास भटकती निरुद्देश्य संवेदनाएं। किसी की किसी से कोई पहचान नहीं। कोई संभावना भी नहीं। भविष्य का कोई सार्थक सपना नहीं। इंसानों के लिए कोई जगह नहीं। एक दरीचा सामने वाले दरीचे को देख कर मुस्कराता नहीं। दीवारें सामने ही खड़ी दीवारों को छूना पसंद नहीं करतीं। वे आपस में बात नहीं करतीं। गोलियों का शोर, संगीनों का खौफ, बारूदों की गंध। आज के सारे पन्ने झूठे सुनहरे वादों से लदे, वर्तमान के चेहरे पर भ्रष्टाचार की कालिख पोते हुए। सत्ता के सारे पाये अपना-अपना चेहरा मुखौटों से मूंदे। सबके पीछे एक डरावनी सूरत। तमाम जनता की उड़ती विह्वल आवाजें और सिंहासन के ढंके हुए कान। उनके कदमों से शैतानी आहट। वह घबरा उठा। यह कहां आ गया हूं। यह कौन सी जगह है। मेरी आंखों में दो और आंखों के सपने हैं, उन्हें कैसे सहेजूंगा। उन्हें लेकर कहां जाउंगा। कहां रखूंगा। पर वापस लौटने की कोई गुंजाइश नहीं। रहना होगा, यहीं इन सबसे एक साथ लड़ना होगा।
हालांकि, अब वह खुद ठीक-ठीक नहीं जानता था कि वह आगे क्या करेगा या क्या होगा?
दिल्ली पहंुच कर उसने मुखर्जी नगर में एक कमरा लिया। मुखर्जी नगर अब तक इलाहाबाद की तरह सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले युवाओं का गढ़ बन गया था। चारों ओर छात्रों की बेहद भीड़ होती, लेकिन उसे इन लोगों में, भीड़ में या दुनिया जहान में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह अक्सर कमरे से निकलता और व्यस्त सड़कों को फलांगता हुआ किसी सुनसान पार्क में जाकर बैठ जाता। घंटों बैठा रहता फिर व्यग्र हो इधर-उधर घूमता और वापस आ जाता।
आकाश खुद के भीतर के द्वंद्व से इस कदर उलझ गया था कि आगे के बारे में कुछ भी सोच सकने की ताकत खो चुका था। अब वह आईने के सामने पहुंचकर डरता नहीं था, घबराता नहीं था, बल्कि उसकी आंखों में आंखें डाल कर कहता-हां, मैं कायर हूं। मैं हत्यारा हूं। तमाम तमाम अंजुओं-काव्याओं का हत्यारा... मैं हत्यारा हूं...

उसने पढ़ाई के या नौकरी के बारे में सोचना बंद कर दिया। शायद इस तरफ उसका ध्यान नहीं जा सकता था। उसने कोई दोस्त नहीं बनाया था। जिन दोस्तों के साथ वह दिल्ली आया था, अब उनसे भी मिलने नहीं जाता था। उसे लगता कि काव्या की मौत के बाद इन लोगों ने मेरा साथ नहीं दिया। फिर इनका कैसा साथ... ये क्या करेंगे? वे सभी कभी मिलने आते तो वह बस यूं ही मिल लेता। बिना किसी दिलचस्पी के। वह कोशिश करता कि किसी के सामने न पड़े। वह दिन भर कमरे में बंद रहता और जब अंधेरा हो जाता तो घर से निकलता। चुपचाप चलता जाता और जब थक कर चूर हो जाता तो देर रात गए लौटता और खुद को कमरे में बंद कर लेता। उसने अब खुद पर कोई ध्यान देना बिल्कुल छोड़ दिया। या कहें छूट गया। दाढ़ी बढ़ी हुई। बाल बढ़े हुए। करीब करीब डरावनी सूरत। हमेशा चुप चुप रहना। अगल बगल के लोग उसे संदेह की निगाह से देखते और उसके मकान मालिक को आगाह करते कि यह आदमी ठीक नहीं दिखता है। इससे होशियार रहना। उसके भीतर के युद्ध से कोई भी वाकिफ नहीं था।

एक रोज वह यूं ही घूमने निकला और रोज की तरह करीब बारह बजे के आसपास आकर फिर कमरे में बंद हो गया। उसी समय दिल्ली के सरोजिनी नगर में विस्फोट हो गया। बीस लोग मारे गए और करीब साठ लोग घायल हो गए। विस्फोट रात करीब नौ बजे हुआ था, जब वह घर से बाहर था, हालांकि वह हमेशा की तरह इस घटना से बेखबर था। विस्फोट के बाद उसके पड़ोसी मकान मालिक के पास पहुंचे और कहा- देखा, हम कहते थे। टीवी पर आतंकी का जो हुलिया बताया जा रहा है, वह बिल्कुल इसी आपके किरायेदार जैसा है। अपनी खैर चाहो तो पुलिस को फोन कर दो, वरना पकड़े गए तो जिंदगी जेल में सड़ जाएगी। मकान मालिक ने बिना कुछ सोचे झटपट पुलिस को फोन मिलाया और बताया कि उसके मकान में एक आदमी रहता है। उसका हुलिया बिल्कुल वैसा ही है जैसा आतंकी का बताया जा रहा है। कुछ ही मिनट में पुलिस आ गई। आकाश अभी-अभी घूम कर लौटा था और अंदर से दरवाजा बंद किए लेटा था। पुलिस ने दरवाजा खुुलवाया और बिना कुछ कहे उसे उठा ले गई। मकान मालिक और मोहल्ले वालों ने उसकी गतिविधियां पुलिस को बता दीं कि वह सिर्फ रात में निकलता है। वह अकेला ही रहता है, उसका कोई दोस्त नहीं है। वह छुप छुप कर आता जाता है। उसकी बड़ी बड़ी दाढ़ी है। वह निश्चित ही आतंकी है।

पुलिस ने अदालत को बताया कि इसका असली नाम अयूब खान उर्फ अबू हमजा उर्फ पप्पू है। आकाश इसका झूठा नाम है। पहचान छुपाने के लिए रख लिया है। इसके खिलाफ चार और धमाकों में शामिल होने के सबूत हैं। आकाश ने अदालत में अपनी सफाई में कुछ नहीं कहा। उसे पुलिस हिरासत में जेल भेज दिया गया।