Thursday, June 7, 2012

जब महाप्राण रोये


इलाहाबाद शहर को आप देभूमि भले कह लें, पर वहां देता बिल्कुल नहीं बसते। कभी रहे हों तो मैं नहीं कह सकता। वहां भी वैसे ही लोग हैं, जैसे हिंदुस्तान भर में या बाकी दुनिया के किसी कोने में पाये जाते हैं। मेरी छह साल की रहनवारी में मुझे वहां कोई देवता नहीं मिला। न इलाहाबाद की चौड़ी सड़कों पर, न संगम तट के दूर तक फैले रेतीले मैदान पर। धर्मवीर भारती के ‘गुनाहों का देवता' वाला नगर देता भी नहीं मिला। छल मिला, कपट मिले, हत्या मिली, बलात्कार मिले। सपनों को पिसते देखा। और कुछ बीत चुकी आत्माओं को बिलखते देखा। दो आत्माएं कई-कई बार मिली- जहां-जहां कुछ धतकरम होता दिखता, वहां-वहां। अक्सर चौड़ी छाती, लंबी दाढ़ी वाला एक 'महाप्राण' क्रंदन करता हुआ दिख जाता था। मैंने उनसे कई बार पूछा- बाबा आप रोते क्यों हैं? वे बोले- जिन बातों को जीते जी नहीं सहा, मरे के बाद वह सब रोज सहना पड़ता है। हमारी संतानें ही हमारे सपनों को रौंद रही हैं। यह सब देखता हूं तो आत्मा रोती है। यह बात कई दफा हमने अपने साथियों को दिखाने-बताने की कोशिश की तो उनने हमें पागल करार दे दिया। कहा-तू अभी कवि हुआ नहीं है, बस होने की कोशिश कर रहा है और अभी से तेरे लक्षण ठीक नहीं हैं। तू विश्वविद्यालय न आकर पागलखाने जाया कर। 

सुना है कि महाप्राण ने अपने जीवन में कभी किसी की आंख में आंसू बर्दाश्त नहीं किये। पुरस्कार में मिली शॉल सड़क पर पड़ी ठिठुरती अधनंगी महिला को ओढ़ा दी तो पूरी की पूरी तनख्वाह रिक्शे वालों में बांट दी। जिस राह से वे गुजरें, उस राह कोई भूखा या नंगा दिख जाये तो जो कुछ पास होता, सब उसे दे आते थे। अब उस धरती पर ऐसा नहीं होता।  
हमने और भी कुछ देखा। कई बार एक ‘दुख की बदली' देखी। इलाहाबाद के आसमान पर मंडराती हुई  उसकी चीख अक्सर ही सुनी जा सकती है। ह कितने सपने बो कर गई थी, सब के सब खौफनाक मौत मारे गये। वह महाप्राण की तरह सड़कों पर नहीं दिखती। उसने अपने जीन की तरह रोने के लिए भी एकांत चुना है। आंसुओं का तिरस्कार शायद उसे बरदाश्त नहीं होता है। संगम तट पर मौजूद अकबर के किले के पीछे चुपके-चुपके कई बार जार-जार बरसते देखा उसे। 

जिन तमाम मौकों पर उन्हें चीखते-बिलखते देखा, उनमें से एक वाकया सुनाता हूं। मैं कहानीकार होता तो इसे कहानी कहता। लेकिन जो मैं कहने जा रहा हूं वह मानव के पशु होने की महा-दुर्घटना है। इसे त्रासदी कहने में मुझे ज्यादा सुविधा हो रही है। 
मार्च का महीना था। मौसम में फागुन की महक और आलस्य दोनों ही घुलने लगे थे। विश्वविद्यालय  परिसर में लगे अमलतास और गुलमुहर के पेड़ों पर फूलों के गुच्छे झूमर की तरह लटकने लगे थे। चहारदीवारियों पर लटकती बेलें परिसर को और सुंदर बना रही थीं। परीक्षा छात्रों की खोपड़ी पर सवार थी और वे लगातार उससे जूझ रहे थे। इसलिए परिसर अब जरा सूना-सूना दिखने लगा था। तमाम छात्रों के कमरे के दराजे कई-कई घंटे बाद खुलते। वे अपने को किताबों में झोंक देना चाह रहे थे। रोज शाम को सड़कों पर, चौराहों पर परीक्षाओं को लेकर हजारों चर्चाएं एक साथ चलतीं। अगर आप इलाहाबाद गये हों, या रहे हों तो आपको मालूम होगा कि हां की शाम बहुत ही सुहानी होती है। हजारों सपने एक साथ सड़कों पर उतर आते हैं। जसे कोई गुलशन गुलजार हो और तमाम फूल एक साथ हंस उठें। हर चौराहे पर हजारों की संख्या में छात्र निकलते हैं, गप्पें मारते हुए चाय पीते हैं, सब्जियां  जरूरत के सामान खरीदते हैं औरोपस अपने कमरे पर आ जाते हैं। ये युवा जीवन की चुनौतियों से जूझने को तैयारी कर रहे होते हैं। दुनिया को अपने मुताबिक आकार देने के सपने देख रहे होते हैं। वे जमाने को दिशा देने की योजनाओं पर सिर धुन रहे होते हैं। उनकी आंखों में उम्मीदों का सैलाब देखकर आपको हौसला मिल सकता है। आपको एक उम्मीद मिल सकती है। हर शाम इस तरह उनका उमड़ना बहुत सुखद लगता है। 

यह एक ऐसा शहर है जहां आकर हर युवा कुछ समय तक के लिए ही सही, पर थोड़ा आदर्शवादी हो ही जाता है। यहां की एक परंपरा है, कि हर विद्यार्थी जैसे ही पहले साल विश्वविद्यालय में दाखिला लेता है, तो सीनियर छात्र उसे गुनाहों का देता पढ़ने की सलाह देते हैं। हर बीए का छात्र कम से कम बीए के दौरान अपने को चंदर समझता है और उसे एक सुधा की तलाश रहती है। यह बात दीगर है कि यह फैंटेसी ज्यादा दिन नहीं टिक पाती। 
इन्हीं आदर्शादी युवाओं में से कुछ कभी-कभी भटकते हैं और वे खुद को हशी होने से नहीं रोक पाते और इन्हीं पर तरस खाकर महाप्राण रोते-बेचैन होते हैं। 

रोज की तरह एक खुशनुमा शाम की बात है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लगा हुआ प्रयाग स्टेशन। करीब पांच बज रहा था। चारों तरफ लोग ही लोग। कुछ भीड़-भाड़ सी थी हर ओर। स्टेशन के बाहर चाय की दुकान पर तमाम लोग जमा थे। प्रयाग स्टेशन से लगा हुआ विश्वविद्यालय का एक हॉस्टल है। उस भीड़ में हॉस्टल के कुछ छात्र भी थे। वे चाय पीते हुए बातों में मशगूल थे कि अचानक एक लड़की आई और दुकानवाले से समोसे मांगने लगी। सामान्य कद-काठी, खूब गोरा रंग। चेहरा धूल-मिट्टी में सन गया था और उस पर काले-काले धब्बे से उभर आये थे। लंबे और कुछ-कुछ घुंघराले बालों में गंदगी के कारण लट पड़ गयी थी। लड़की मानसिक रूप से विक्षिप्त लग रही थी। उसके कपड़े बुरी तरह मैले हो चुके थे और जगह-जगह से उनके फटे होने की जह से बाकी शरीर के साथ स्तनों के कुछ हिस्से बाहर झांक रहे थे। एक हाथ पर आस्तीन थी और दूसरा कंधे तक खुला था। सर से पांव तक गंदगी में सनी होने के बाद भी वह देखने में खास बुरी नहीं लग रही थी। यह अंदाजा लग रहा था कि एक सुंदर सी दिखने वाली लड़की है, जो पागल हो गयी है। इधर कुछ दिन से वह स्टेशन के आसपास घूमते हुए दिख जाती थी। वहां मौजूद सब लोग उसे ही देखने लगे। वह समोसे लेने के लिए हाथ फैलाए हुए दुकान वाले के और करीब चली गयी तो उसने उसे डांटा और वहां से भाग जाने को कहा। इस पर लड़कों के झुंड से एक ने उस पर दया दिखाई और दुकान वाले से बोला- जो मांगे, दे दो उसे। पैसे की चिंता मत करो। देख नहीं रहे हो उसका दिमाग थोड़ा ठीक नहीं है? लड़की बिना किसी ओर देखे उसी मुद्रा में दोनों हाथ फैलाए खड़ी रही। दुकान वाले ने उसकी दोनों हथेलियों पर एक-एक समोसे रख दिये। वह एकदम निस्तब्ध थी। न हंस रही थी, न मुस्करा रही थी, उसने कुछ देर तक समोसे लिए हुए हथेलियों को निहारा और फिर एक ओर खिसक कर खाने लगी। इस बीच लड़कों की आपसी बातचीत बंद हो गयी थी और सब के सब उसी को देख रहे थे। एक लड़के ने आवाज दी तो लड़की ने पलट कर देखा। लड़के ने उसे पास आने का इशारा किया। वह आकर उसके बगल खड़ी हो गई। लड़के ने पूछा- भूख लगी है? 

उसने हां में सर हिलाया। लड़के ने पूछा- जलेबी खानी है? उसने फिर हां में सर हिलाया। लड़के ने दुकानवाले से कहकर उसे जलेबी दिलायी। वह खाने लगी और लड़के उससे कुछ-कुछ साल करने लगे। लड़की बेतहाशा बड़े-बड़े निवाले खाए जा रही थी और उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दे रही थी। एक लड़के ने थोड़ी रुखाई से कहा- ये तो सुनती ही नहीं है, बहरी है क्या? इतना कहना था कि वह जोर से हंसी और चबाते हुए शब्दों में बोली- हा.हा..हा.हा.. यही तो वह भी कहता था कि तू बहरी है। तू कुछ नहीं सुनती। उसे कैसे बताती कि तुम्हारे अलावा कुछ सुनाई नहीं पड़ता़.. हा.हा..हा.हा..
सब लड़कों ने एक दूसरे को जिज्ञासा से देखा और अंदाजा लगाया कि हो सकता है कि इसका प्रेमी इसे छोड़ गया हो। खैर, क्या हुआ उससे क्या लेना देना? 

एक ने फिर पूछा- चाय पिओगी? उसने हां में सिर हिला दिया। चाय आ गयी। उसने चाय पी ली। अब वह थोड़ी खुश दिखने लगी। शायद भूख मिट जाने के कारण। लड़के लगातार ठिठोली किये जा रहे थे। कोई नाम पूछ रहा था। कोई घर पूछ रहा था। कोई पूछ रहा था- कपड़े कैसे फट गये? कोई पूछ रहा था इतनी गंदी हो, नहाती क्यों नहीं? एक लड़के ने बुरी तरह आंख नचाते हुए उसके स्तनों की ओर इशारा किया- कपड़े खींच कर उसे ढंक लो? इस पर लड़की ने कपड़े में हुए छेद में उंगली फंसाई और खींच कर थोड़ा सा और फाड़ दिया। इस पर लड़के ठहाके मार कर हंस पड़े। 

लड़कों की बातें और हरकतें पास की बेंच पर बैठे एक बुजुर्ग को बुरी लगी तो वे उठे, बुदबुदाते हुए एक भद्दी सी गाली दी और चले गये। 
इतनी देर में वह लड़की इन लड़कों के लिए तमाशा बन चुकी थी। वे सभी भरपूर मजा लेने को आतुर थे और लड़की इस सबसे बेखबर। अब वह अपने शरीर के प्रति सजग स्त्री नहीं रह गयी थी। शायद अब उसे किसी बुरी निगाह से डर लगना बंद हो गया था। वह चाय पी चुकने के बाद भी बेखौफ बैठी रही। शायद बहुत दिनों बाद उसे किसी ने खिलाया पिलाया हो, और यह उसे अच्छा लगा हो। या जो भी हो, पर वह खा-पी चुकने के बाद भी वहां से गयी नहीं। ऐसा शायद इसलिए भी हो, कि अब जब उसे देह बचाने का डर नहीं है, तो वहां से हटने का ख्याल ही क्यों आये? 

थोड़ी देर बाद लड़कों ने एक दूसरे को इशारा किया कि अब चलना चाहिए। सभी उठ खड़े हुए। वह बैठी रही। एक ने कहा- आओ तुम भी चलो। उसने इशारे में पूछा- कहां? दूसरे ने कहा- आओ आओ तुम भी चलो साथ। खाना खाओगी? खाना है तो आओ। वह उठी और उन लोगों के पीछे चल दी। 

सब लोग हॉस्टल पहुंचे तो जाने क्यों ह बाहर ही ठिठक गयी। लड़के उसे अंदर बुलाने की कोशिश कर रहे थे मगर ह बेपरवाह इधर-उधर देख रही थी। अंतत: वे उसे फुसला कर अंदर बुलाने में कामयाब रहे। 
लड़कों कि आपस कि बातें ऐसी थीं कि उन्हें सुनने वाला सोच सकता था कि इस लड़की का जीवन अब सफल हुआ। उसकी चिंता करने वाले उसे मिल चुके हैं और अब वह अपनी तकलीफों से मुक्त हो जाएगी। 

सारी पटकथा तैयार हो गयी। सब लड़के एक कमरे में इकट्ठा हो गये। यह उस गैंग के सरदार का कमरा था। लड़की को अंदर बुलाकर सीधे बाथरूम ले जाया गया।  दो लड़कों को उसे खूब अच्छी तरह नहलाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी ताकि वह साफ सुथरी हो जाये और बदबू न करे। हॉस्टल के तमाम लड़कों के लिए जसे कठपुतली नाच सरीखा कोई खेल चल रहा था। वे यह सब देख रहे थे और मजे ले रहे थे। आखिर जूनियरों को वहां से यह कहकर भगा दिया गया कि क्या तमाशा देख रहे हो? अरे बेचारी पागल है। जरा उसको सलीके से कर देंगे तो ठीक रहेगा। इतनी सुंदर लड़की मारी-मारी फिर रही है। चलो, सब भागो यहां से।  

दोनों लड़कों ने उसे बाथरूम में लाकर नहाने को कहा तो वह  सहर्ष जा कर पानी की बाल्टी के पास बैठ गयी। उन्होंने उस पर पानी डालना शुरू किया। नहाना शायद उसे अच्छा लग रहा था। वे उस पर पानी डालते तो वह उछल कर खुश होती। एक लड़के ने उसके हाथ में शंपू उड़ेला और बालों में लगाने को कहा। उसने बालों को शंपू किया, पर बेसलीका तौर पर। साबुन लगाने की दफा वह अजीब हरकतें करने लगी। एक ने उसे साबुन पकड़ाया तो वह हाथ में लेकर उसे सूंघने लगी। उन्होंने चेहरे में लगाने को कहा तो उसने साबुन पानी में डाल दिया। काफी कोशिश के बाद भी वह ढंग से अपने अंग साफ नहीं कर रही थी और सबकी राय थी कि यह जरूरी है। दो लोग नहला रहे थे बाकी बार-बार आ-जा रहे थे, मुआयना कर रहे थे। अंतत: फैसला हुआ कि उसके कपड़े भी तो कितने गंदे हैं। उन्हें फेंको उतार कर और उसे अपने हाथों से खुद नहलाओ। पहले तो दोनों लड़कों ने थोड़ा संकोच किया, लेकिन फिर जुट गये। दरवाजा बंद कर लिया गया। उन्होंने उससे कपड़े निकालने को कहा तो वह भाग कर एक किनारे दीवार से जा लगी और जोर जोर से सिर हिलाने लगी। एक लड़के ने बढ़कर उसे खींच लिया और उसके कपड़े लगभग फाड़ते हुए उतार दिया। इस पर वह जोर जोर से चीखने लगी। उसकी चीख हॉस्टल भर में फैल रही थी। दूसरे लड़के ने उसका मुंह जोर से साध लिया और उसे पुचकार कर समझाने लगा कि चिललाओ मत, नहा लो अच्छी तरह, फिर तुम्हें नये कपड़े पहना देंगे। फिर तुम खूब सुंदर लगोगी। वह नहीं मानी तो दूसरे ने उसका मुंह खूब जोर से दबा दिया जिससे वह बेतरह डर गयी और चुपचाप कांपती रही। वे दोनों उसे पुचकारते रहे और वह जाल में फंसी सहमी हिरनी की तरह सांस थामे उन दोनों को देखती रही। उन्होंने उसे एकदम नंगा कर दिया था और साबुन लगा-लगा उसे नहला रहे थे। वह बीच बीच में भागने की कोशिश करती तो वे उसे दबोच लेते। वे काफी देर तक उससे उलझे रहे। 

यह कहने की जरूरत नहीं कि उनका उद्देश्य उसे नहलाना नहीं था। जो था, उसे अंजाम दिया जाना शुरू हो चुका था। उसे नहलाते हुए वे उसके अंगों को छेड़ रहे थे। खिलौने की तरह उससे खेल रहे थे। वह लड़की यदि विक्षिप्त न होती तो शायद कुछ और होता, शायद वह चीखती, रोती, गिड़गिड़ाती। पर यहां बात और थी। उसकी चेतना इस सब से परे हो चुकी थी और क्या हो रहा था उसे क्या पता? हां, वह बार-बार छुड़ाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। काफी देर हुई तो बाहर दराजे पर गैंग के सरदार ने दस्तक दी- अबे क्या कर रहे हो? बाथरूम में ही सही कर दोगे क्या? ले आओ अब, बस हो गया। इतना साफ कर दो कि उल्टी न हो जाये बस। 
अंदर से आवाज आयी- क्या करें भाई, साली हाथ नहीं रखने दे रही। वैसे हो गया। बिना सुरक्षा कच के और कुछ करने लायक नहीं है। ले चलो कमरे में। 

उन्होंने तौलिए से उसे पोंछ कर उसके शरीर का पानी सुखाया। फटी पुरानी एक लंबी टी-शर्ट किसी की लाकर पहना दी। नीचे तौलिया लपेट दिया और उसे कमरे में ले आये। एक ने कमरे की आलमारी पर रखा डियो और पाउडर का डिब्बा बढ़ाते हुए कहा- इसे भी लगा दो, ठीक रहेगा। और दूसरे ने डियो की शीशी से उस पर फुहारें बरसा दीं। जब तक उसे नहलाया गया, तब तक इधर कंडोम और वियाग्रा के पैकेट मंगाये जा चुके थे। 
रात के आठ बजने को थे। शहर धीरे-धीरे शांत होने लगा था। आसमान में तारे बिछ चुके थे। चांद क्षितिज पर सहमा हुआ सा चुप-चुप झांक रहा था। हॉस्टल के सामने वाली सड़क पर कुछ कुत्ते घूम रहे थे जो कभी-कभी रोने जसी आवाजें कर रहे थे। सन्नाटे में घुली हुई रात की स्याह तासीर चारों ओर पसर गयी थी। शैतानी ताकतें और सक्रिय हो गयीं थी। हॉस्टल के कॉमन रूम में कुछ एक जूनियर छात्र बैठे थे और शनि देओल की किसी फिल्म का रेप सीन चल रहा था। खलनायक थे, बलत्कृत होती मासूम नायिका थी और कुछ मरी हुई चेतना वाले तमाशबीन थे। उस दिन फिल्म में हीरो की एंट्री नहीं हुई, न ही ‘कुत्ते मैं तेरा खून पी जाउंगा' जैसा कोई डायलॉग सुनाई दिया। 

जिन दो लड़कों ने उसे नहलाया था, उनमें से एक ने कहा- भाई, है बहुत कंटास पीस। समझ लो एकदम आग है। मेरा तो दिमाग गरम हो गया, अब काम ही नहीं कर रहा। गैंग का सरदार बोला- ठीक है, ठंडा कर लेना अभी। एक और लड़के ने कहा- तो भाई देर किस बात की। बकरा तैयार है। बेदी भी। पूजन सामग्री भी। बस, हलाल करना बाकी है। सरदार थोड़ा झिड़कते हुए बोला- जाओ भागो सब यहां से, थोड़ी देर में बुलाउंगा तो आना। सरदार को छोड़कर बाकी पांच लोग कमरे से बाहर चले गये और कमरा बंद हो गया। 
सरदार लड़की की ओर बढ़ा तो लड़की तख्त पर लगे बिस्तर पर एक कोने सिमट कर बैठ गयी। उसने नजदीक जाकर उसे पकड़ लिया। वह झिटक कर भागने की कोशिश में तख्त से नीचे आ गयी। थोड़ी देर यह सिलसिला चलता रहा कि सरदार के भीतर का पशु उस अबोध पर झपट पड़ा। एक झटके में उसके गिर्द लिपटा तौलिया दराजे के पास जा गिरा। टी-शर्ट फाड़कर शरीर से दूर फेंक दी गयी। क्षिप्त लड़की भी शायद अपने लुटने की आहट कुछ देर पहले ही पा चुकी थी और निर्वसन खड़ी कांप रही थी। आखिर शिकारी एक चेतनाशून्य जीव का शिकार करने में कामयाब हो गया। 

हर कोमल चीज क्रूरता के आगे हार जाती। दीन-दुनिया से अनजान एक पागल, जो ऐसे ही किसी आघात से अपने को खो चुका था, चेतनाहीन हो चुका था, उसे कुचला गया। उसकी देह को खिलौना बनाया गया यह बोध भी तो उसे नहीं हो सकता था। दो समोसे खाकर वह उस बंदर की तहर फंस गयी थी जो दाने के लालच में संकरे घड़े में हाथ डाल तो देता है, लेकिन अनाज भरी बंद मुट्ठी निकाल नहीं पाता और पकड़ा जाता है। 

एक के बाद एक बाकी पांच लोग भी आये गये। कोई दो बार, कोई चार बार या जिससे जितना हो सका। दो जन की बारी तक वह अपने को बचाने की कोशिश में छटपटाती रही थी। तीसरे की बारी आने तक वह बेहोश हो गयी थी।
अगले दिन सुबह वह कमरा बंद था। कुछ-कुछ देर बाद कोई एक जाकर दराजा खोल कर मुआयना कर आता- अभी मरी नहीं है। सांस चल रही है। अगर मर गयी तो? तो रात को लाद कर गंगा के कछार में फेंक आएंगे..। 

तीन बजे उसे होश आया तो वह दराजा पीटने लगी। एक ने आकर दराजा खोला। अब तक वह निर्वसन थी और बेहद डरावनी हो गयी थी लेकिन वह डरा नहीं। उसने उसे वह टी-शर्ट फिर पहना दी, जो कि काफी कुछ फट चुकी थी। एक पुराना सा पैंट नीचे पहनाया गया। अब तक सभी कमरे में इकट्ठा हो गये थे। अब तक सबकी यह राय जाहिर हो चुकी थी कि जल्दी से इसे यहां से दफा करो, वरना मुसीबत गले पड़ सकती है। एक ने उसे बिस्कुट का पैकेट खाने को दिया। उसने पैकेट हाथों में लेकर देखा और नीचे गिरा दिया। 
जैसे ही लड़कों ने उसे छोड़ा, वह दरवाजे से बाहर निकल गयी और तेज कदमों से चलती गयी। दो लड़के उसका पीछा करने लगे कि देखो कहां जाती है? वह प्रयाग स्टेशन तक गयी और एक भूजा वाले ठेले के पास खड़ी हो गयी। ठेले वाले ने उसे दो- चार मूंगफलियां दी जिसे लेकर मुंह में भरते हुए वह आगे निकल गयी। 

आखिरी बार उसी जगह हमने महाप्राण को दहाड़ मार-मार कर रोते देखा। ठीक उसी समय वह दुख की बदली रेजा-रेजा बिखर रही थी.. बरस रही थी, किले की दीवार के पीछे। उसके बाद मैं इलाहाबाद कभी नहीं गया। 

Wednesday, May 30, 2012

जाको राखे अमरीका


वह अमेरिकी दूतावास के सामने खड़ा आटो का इंतजार कर रहा था और सोच रहा था कि दिल्ली में अमेरिकी दूतावास होने की क्या जरूरत है? सुबह ही उसने एक विलुप्तप्राय से अखबार में एक अमेरिकी स्कालर का बयान पढ़ा था, जिसमें उसने कहा था कि वह आया था गांधी का भारत देखने, लेकिन यहां सी-ग्रेड का अमेरिका देख रहा है. सुबह से उसके दिमाग में यही एक बात गूंज रही थी कि इंडिया दैट इज भारत, दैट इज सी ग्रेड अमेरिका... दूतावास के सामने दूर तक लंबी लाइन लगी थी. ये लोग अमेरिका जाने के लिए वीजा बनवाने की कतार में खड़े थे, जैसे दिल्ली से बिहार जाने वाली ट्रेन के लिए टिकट काउंटर पर लाइन लगती है. 

वह सोच रहा था कि भारत में जब शहर-दर-शहर, गली-गली अमेरिका है और फैलता जा रहा है तो अलग से अमेरिकी दूतावास की जरूरत क्या थी. वैसे है तो यह सिर्फ एक दफ्तर, जहां से अमेरिका संबंधी प्रशासनिक कामकाज होता है, लेकिन वीजा भी तो भारतीय दफ्तरों से ही मिल सकता है. अब तक वीजा चाहने वालों की लाइन और लंबी हो गयी थी. लग रहा था कि अब वहां की जगह छोटी पड़ जायेगी. न सिर्फ दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के लिए, बल्कि पूरे भारत में अमेरिकी विस्तार के लिए. यह बात उसे थोड़ी परेशान भी कर गयी कि अमेरिका के विस्तार के लिए बेचारा भारत कितना छोटा है? 

लोग कतारों में खड़े थे और अंग्रेजी में बातें कर रहे थे. वह चुपचाप खड़ा-खड़ा कुढ़ रहा था कि काश मुझे भी अंग्रेजी आती तो इन लोगों से पूछता कि वे अमेरिका के लिए पागल क्यों हैं? उन्हें हिंदी आती होगी, वह ऐसी आशा नहीं करता. 

भागम-भाग और अफरा-तफरी जैसी स्थिति थी. उससे थोड़ी दूर पर एक कम उम्र की औरत गोद में अपने एक या दो साल के बच्चे को लिए किसी मर्द से बातें कर रही थी. बच्चा कुछ कहना चाह रहा था. वह बार-बार उसका मुंह पकड़ कर अपनी ओर घुमाने की कोशिश करता तो वह उसे एक चाकलेट पकड़ा देती. बच्चा हर बार चाकलेट फेंक दे रहा था. जब उसने तीसरी बार चाकलेट फेंक दी तो स्त्री थोड़ी दूर किनारे पर खड़ी कार के पास गयी. कार का दरवाजा खोला और बच्चे को अंदर बंद कर दिया. अब सारी चिकचिक खत्म. बच्चा गाड़ी के अंदर शीशे से चिपक कर चीख रहा था. उसकी मां ने उसकी ओर पीठ कर ली और बातें करने में मग्न हो गयी. वह बातचीत के बीच-बीच में अपने बाल झटक रही थी. उसने एक झीनी सी मिनी स्कर्ट पहन रखी थी. उसे याद नहीं आ रहा था कि आज से पहले उसने इतनी भद्दी स्त्री कभी देखी हो. 

उसे आटो पकड़ कर आईटीओ पहुंचना था. वहां वह एक ’आंदोलनकारी’ अखबार के दफ्तर में काम करता है, लेकिन पत्रकार नहीं है. वह अखबार के दफ्तर में नौकरी करता है और निश्चित तौर पर पत्रकार नहीं है. उसके दफ्तर में कोई भी पत्रकार नहीं है. वह डर रहा है कि अगर उसे देर हुई तो दफ्तर से बॉस का फोन आ सकता है, जो न सिर्फ देर होने के लिए डांटेगा, बल्कि ’अगर काम न कर पाना हो नौकरी छोड़ दो’ जैसी सलाह भी दे डालेगा. 

 वह खड़ा ऐसा सोच रहा था और उसके ठीक बगल एक बूढ़ा आदमी बैठा था. वह शायद खड़ा नहीं हो सकता था. आम तौर पर जैसी बूढ़ों की आदत होती है कि वे चुप नहीं बैठते और हर किसी को कोई न कोई सलाह देते रहते हैं, इसके एकदम विपरीत वह चुपचाप था. उसकी यह चुप्पी काफी परेशान करने वाली थी क्योंकि वहां सिर्फ तेज रफ्तार गाडि़यों के गुजरने की सांय सांय ही सुनाई देती थी, जिसमें कोई भी व्यक्ति डर सकता था. इस दौरान वह सोच रहा था कि मेरे बाबा होते तो क्या-क्या सलाह दे डालते. वह सोच रहा था कि काश इस भयानक शहर में लोग एक दूसरे को पहचानते होते. 

वह आते जाते वाहनों को बेपरवाही से देख रहा था. कौन जाने किस गाड़ी में किसी लड़की का पांच-सात लोग मिलकर बलात्कार कर रहे हों, जैसा ठीक एक दिन पहले हो चुका था और आज उसने अखबार में यह खबर पढ़ी थी. या फिर किसी गाड़ी में किसी पूंजीपति की दलाली करने वाली महिला किसी बहुत बड़े पत्रकार से फोन पर बात करती हुई जा रही हो और उसका ड्राइवर इस बातचीत में कोई रुचि न ले रहा हो. या मजे ले रहा हो और सोच रहा हो कि देश का बोझ न तो मेरे सर पर रखा है और न ही वे लाखों करोड़  मेरे पिता जी के जेब से आये हैं जो घोटाले में खाये जायेंगे. या फिर उसे अपने ड्राइवर होने का बोध इस हद तक हो कि वह भाई- भतीजावादी पूंजीवाद में नेता-पत्रकार और कारपोरेट के बीच के गठबंधन में कोई दखल देना अपने अधिकार और पहुंच से बाहर की बात समझता हो. बहुत मुमकिन यह भी है कि वह सब समझ रहा हो, कुढ़ रहा हो मगर मालिक की तरफ से की जाने वाली देशसेवा के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत न जुटा पा रहा हो. कौन जाने कि वह भी एक समझदार और पढ़े लिखे भारतीय की तरह सोचता हो, कि दुनिया जाये भाड़ में, अपने राम को क्या लेना? 

वह इस शहर में चार महीने पहले पहुंचा है और अब लौटने के बारे में सोच रहा है. पर मुश्किल यह है कि रोटी उसे गांव लौटने नहीं दे रही और यह शहर उसे यहां रहने नहीं दे रहा. बड़े-बड़े बंगले हैं. चैड़ी-चैड़ी सड़कें  हैं. सनसनाती गाडि़यां हैं. वीरान से मंजर हैं. अगर आप सहम कर मर नहीं जाते, तो गारंटी है कि घुट-घुट कर जी सकते हैं. उसकी प्रेमिका, जो उसके साथ दिल्ली में नहीं है,  उसे बहुत समझदार और इस दुनिया के कुछ-एक नेकदिल इंसानों में से एक मानती है. पर शायद ऐसा सोचने वाली वह इस दुनिया की अकेली प्राणी है. जब वह आने लगा था तो उससे वादा करके आया था कि शहर से नौकरी लेकर वह जल्द ही लौटेगा और उससे शादी करेगा. 

वह इस महानगर में खो गया है और उसे बारहा डर लगता है कि वह खोखला हो रहा है और अपनी प्रेमिका को अपने भीतर महफूज नहीं रख पायेगा. उसे यह भी पता है कि वह रोज रात में देर तक जागती है. जब सभी घर वाले सो जाते हैं तो वह सिसकियों का गला घोंट कर अपने तकिये भिगोया करती है. यह सब सोच कर अक्सर वह दुःखी हो जाता है. जब भी उसे रुलाई आती है और तमाम प्रयत्नों के बाद भी नहीं रुकती तो वह खुल कर रो लेता है. लेकिन यह बात उसके अलावा इस दुनिया में कोई नहीं जानता. वह कभी कभी कविताएं लिखता है जो कविता कम, उसकी प्रेमिका के प्रति उसका माफीनामा ही अधिक होती है. फिलहाल वह उसके लिए इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि इससे ज्यादा उसके पास समय नहीं है. 

वह लोगों से बात करने में हिचकता है. उसकी समस्या है कि जब वह किसी अंग्रेजीनुमा हिंदुस्तानी को देखता है तो सोचता है कि उससे बात कैसे करूं? कहीं वह अंग्रेजी में बोलेगा तो? वह तो मुझे आती नहीं. और तमाम मंथन के बाद वह उससे बात नहीं करता. हर ऐसी घटना के बाद उसे एक चुक-चुके आरएसएस कार्यकर्ता की एक बात याद आती है जिन्होंने एक बार मजाक में कहा था कि भारत में रहना और कमाना खाना है, इज्जत पानी है तो अंग्रेजी पढ़ो. मैकाले धर्म ग्रहण कर लो. यह मसला भाषा का नहीं, मैकाले होने का है...
मजाक में कही गयी यह बात उसे अपनी नियति लगती है. 

दिल्ली किसी को भी आसानी से आंख मूंद कर चलना सिखा देती है. यहां हर व्यक्ति सड़कों पर आंख मूंद कर चलता है और चलता रहता है. चैड़े हाइवे पर तमाम युवा सपनों का बलात्कार होता है, जिसे लोग अपने-अपने घरों में टेलीविजन की आंख से देख लेते हैं. इस शहर ने दरवाजों के सामने सन्नाटे पैदा कर लिये हैं और कमरों में कृत्रिम सा संसार बसा लिया है. इन गलियों में तमाम सपनों की चीख नक्कारखाने में तूती की तरह गुम हो जाती है. उनकी बदहाल सूरतें खेलकूद वाले पोस्टरों से ढंक दी जाती हैं ताकि देश  काफी खूबसूरत दिखे. अंकल सैम सिर्फ पैकेट की तारीफ करते हैं. अंदर क्या भरा है, इससे उनको कोई सरोकार नहीं. दिल्ली की गलियों में कहीं भी आंख-कान खोल कर खड़े हो जायें तो मिर्चपुर से दंतेवाड़ा तक सपनों के निकलते जनाजे दिखाई पड़ते हैं. लोकतंत्र सीना चौड़ा किए रेसकोर्स पर दलीलें दे रहा है और और तमाम इरोम शर्मिलाएं जंतर-मंतर आ-आकर वापस लौट जाती हैं. वे एक-एक दशक से गांधीवाद का पुछल्ला पकड़े भूख हड़ताल पर हैं. उन्हें यह भ्रम है कि एक दिन विश्व का सबसे बड़ा स्वयं-भू  लोकतंत्र उन्हें कानूनी बलात्कारों से मुक्ति दिला देगा. वह अपनी सेना को युवतियों का बलात्कार करने से रोक लेगा...

उसने अपने जेहन में दिल्ली की तस्वीर उतार ली है, जो दफ्तर जाकर फिलहाल किसी से नहीं बतायेगा. अपने बास से भी नहीं, वरना उसकी नौकरी जा सकती है. तस्वीर एकदम सुर्ख है. उस पर लाल और काले रंग में फिल्म की शुरूआत होने की तरह एक डिजाल्व चल रहा है- नेता, मंत्री, न्यायाधीश, लाल निशान, गवा, कलम के सिपाही, कारपोरेट और नेपथ्य में  चीख....तमाम चीख.....

वह बूढ़ा अभी भी चुपचाप बैठा था. लड़का इसी तरह ऊटपटांग सोच-विचार रहा था कि इसी बीच एक आटो आकर उसके पास रुका. उसने पूछा- आईटीओ चलना है, कितने पैसे लोगे? आटो वाले ने कहा- 80 रुपये. इतने में बूढ़ा बोला- क्या रे, आईटीओ के 80 रुपये किधर से हुए. ले जा 60 रुपये में या फिर मीटर से जा. आटो वाला मुस्कराया बोला- ठीक है आ जाओ. बूढ़े ने कहा- मुझे भी ले चल, आगे रेसकोर्स छोड़ देना. वो जो अपना सरदार है न, मनमोहन, उसी के बंगले की तरफ मेट्रो स्टेशन है. वहीं तक जाना है. बीस रुपये ले ले. आटो वाला समझ गया कि बुढ़ऊ हैं पक्के घाघ. इनके आगे मेरी नहीं चलेगी. उसने दोनों को अंदर बैठने का इशारा किया. दोनों आटो में बैठ गये. अचानक बूढ़ा लड़के से ज्यादा जवान लगने लगा. उसके हाथ कांप रहे थे, होंट मुस्करा रहे थे. लड़का थोड़ा सहम कर बैठ गया.  

जब आटो ने स्पीड पकड़ ली तो बूढ़ा ड्राइवर से बोला- मनमोहन का घर जानता है न? उसने हां में सर हिलाया. फिर पूछा- सोनिया का? फिर उसने हां में सर हिलाया. बूढ़े ने कहा- जानते हो, ओबामा आने वाला है भारत, और साला कांग्रेस की फटी पड़ी है. आटो वाले ने पूछा- कौन ओबामा? उसने झल्ला कर कहा- अरे साला ओबामा को नहीं जानता. ओबामा मतलब बड़का मामा. वह अमेरिका का राष्ट्रपति है. साला तू खाली फटफटिया मत चलाया कर. कुछ दुनियादारी जान ले तो बच्चों को बताने के काम आएगी. बच्चे तो होंगे ही. उन्हें बताया कर कि इस जमाने में अमेरिका को सारा जहान माई-बाप मानता है. 

अमेरिका इस दुनिया का आखिरी सच है. लड़का सोच रहा था कि यह कितना सच है? बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और भारत के आंखों के तारे. अचानक उसके दिमाग में ओबामा का भारत दौरा और उस दौरान की अखबारों की सुर्खियां और खबरिया चैनलों पर गूंजने वाला ओबामा राग, सब गूंज गया. उसने सोचा, हां अमेरिका इस दुनिया का आखिरी सच  है. वह जिसे कह दे वह आतंकवादी, जिसे कह दे वह शांतिपुरुष. अमेरिका जिसे अधिकार दे वह अधिकारी, जिसे अपराधी घोषित कर दे वह अपराधी. जिसे जिलाये वह जिये, जिसे मारे वह मरे. जिसे दे वह खाये, जिसे न दे वह कटोरा फैलाये. देखते नहीं, कैसे कतारें लगती हैं? चैरासी के दंगों में न्याय चाहिए, हस्तक्षेप करें ओबामा. गुजरात दंगों में न्याय चाहिए, दबाव बनायें ओबामा. भोपाल गैसकांड में न्याय चाहिए, फरियाद सुनें ओबामा. कश्मीर में विवाद है, विवाद सुलझाएं ओबामा. भारत-पाकिस्तान में साठ साला रगड़ा है, मध्यस्थता करें ओबामा. चीन-जापान में खटपट है, टांग अड़ाएं ओबामा. ईरान भी अब मुंहजोर हो गया है, सबक सिखायें ओबामा. ईराक और अफगान ध्वस्त हो गये, उन्हें भी बसायें ओबामा. तालिबान से खतरा है, उन्हें मार गिरायें ओबामा. पाकिस्तान की हालत नाजुक है, अनुदान बढ़ायें ओबामा. दुनिया में अन्याय है, हाय ओबामा. आयें सबका न्याय करें. वाह ओबामा. कर्ता- र्ता-संहारकर्ता, सब के मालिक ओबामा. जय हो ओबामा. 
तो वे बुढ़ऊ बाबा गलत नहीं थे. यह ऐसा युग है जहां चारों ओर अमेरिका की धूम है. अमेरिका का गुणगान है. चारों तरफ गूंज है. अमेरिका महान है. अमेरिका हम सबकी जान है. 

आटो रेसकोर्स की ओर चला जा रहा था और बूढ़ा धीरे-धीरे मुस्करा रहा था. लड़का घबरा रहा था. 
वह उसकी मनःस्थिति का अंदाजा लगा पाता कि तब तक बूढ़ा ड्राइवर के कंधे पर धीरे से हाथ रखकर बोला- यह जो अपना सोणा सरदार है न! मनमोहन, अरे क्या कहना. बहुत भोला है. इतना भोला, कि वह प्रधानमंत्री होकर भी प्रधानमंत्री नहीं है. यह पहली बार है जब आजाद भारत में प्रधानमंत्री इतना बेचारा हुआ हो. मैंने पिछले साठ साल तो अपनी आंखों से देखे हैं लेकिन प्रधानमंत्री नौकरी करता हो, ऐसा तो न देखा, न सुना. देख बेटे, हो सकता है कि तू भी सरदार हो, पर बुरा मत मानियो. उसके सरदार होने न होने से कोई  फर्क नहीं पड़ता. मैं उस सोणे आदमी को कुछ नहीं कह रहा. मैं तो उस प्रधानमंत्री को कह रहा जिसके राज में लाखों करोड़ का घोटाला हो जाए और वो देश को आश्वासन भी न दे सके कि वे जनता और उसके खून-पसीने की कमाई की रक्षा करेंगे. वह ईमानदार है, यह तो हर कोई मानता है, लेकिन है तो ऐसी सरकार का मुखिया, जो कुर्सी बचाने के लिए नंगा नाचती रहती है. उन्होंने लोकतंत्र की नई इबारत लिख डाली. अब जमहूरियत में बंदों को गिना नहीं खरीदा जाता है...

आटो वाला लड़के को शीशे में देख कर मुस्कराया. अब तक आटो रेसकोर्स पहुंच गया था और आटो वाला इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा था. उसे एक ग्राहक निपटाकर दूसरे की ओर लपकने की जल्दी थी. उसकी सारी दिलचस्पी अपने धंधे में थी, ठीक वैसे किसी खिलाड़ी की दिलचस्पी अपने खेल में और खेल कराने वाले की दिलचस्पी अपने ’खेल’ में होती है. भारत एक ऐसा देश है, जहां हमेशा कोई न कोई ’खेल’ होता रहता है. सपेरों का देश अब खिलाडि़यों के देश में बदल गया है. किसी भी खेल को जमकर बढ़ावा दिया जाता है. खिलाड़ी बेखौफ हो-खुलकर खेलते हैं. यह कहानी उसी समय की है जब दिल्ली में एक अंतरारष्ट्रीय खेल खत्म हो चुका था और पैसा ी हजम हो चुका था. ये और बात है कि इस बार चूरन में भी  खेल हो गया और कुछ-एक घाघ खिलाडि़यों का हाजमा कुछ खराब सा हो गया. 

आटो रेसकोर्स मेट्रो स्टेशन के सामने पहुंचा और रुक गया. बूढ़ा उतर कर अपनी जेब से पैसे निकाल रहा था और बगल से गुजर रही एक खूबसूरत लड़की को देख रहा था. ड्राइवर ने चुटकी ली- क्या देख रहो हो जी उधर.. पहले पैसे दे दो मुझे, फिर जाओ उसके साथ. बूढ़ा बोला- मेरी औकात उसके साथ जाने की नहीं है. बहुत पैसे लेगी. तू कमाता है, चाहे तो जा सकता है. ड्राइवर बोला, नहीं साहब! अब वे दिन कहां, जवानी में ी ये सब नहीं कर पाया. मेरे साथियों ने खूब मजा किया. अब तो फंस गया हूं बीबी-बच्चों में. दोनों रेंकने के अंदाज में सर ऊपर करके हंसे और अपने-अपने रास्ते चल दिये. वे दोनों उस लड़की को राह चलते शायद पहली और आखिरी बार देख रहे थे लेकिन आश्वस्त थे कि वह पैसे लेकर चल सकती है. ऐसा वे बचपन से सोच रहे होंगे. यह सब उनकी विरासत है. आखिर वे उसी दिल्ली के हैं, जो हर कुछ मिनट पर एक लड़की के बलात्कार की गवाह बनती है.  

आटो आईटीओ की तरफ पहुंच रहा था और लड़का सोच रहा था कि ये रास्ता कभी खत्म न होता, तो ठीक रहता. क्या पता दफ्तर पहुंचते ही उससे कहा जाय कि देखो, तुम काफी टैलेंटेड  हो. तुम यह काम कर सकते हो. सैकड़ों लोग मर गये हैं. इस पर स्टोरी करनी है. इसमें इमोशंस डालनी है. ऐसी कि लोग खूब दिलचस्पी से पढ़ें. और उसे रिपोर्टिंग के लिए जाना पड़े, जैसा कि पिछले हफ्ते हुआ था. 

उस दिन जब वह घटनास्थल पर पहुंचा तो नजारा काफी खौफनाक था. लाशों के ढेर चारों तरफ पत्रकारों और कैमरों से घिरे थे. मेला जैसा लगा था. टीवी चैनल की एक खूबसूरत सी दिखने वाली रिपोर्टर, जो जरूर सेलिब्रिटी होने के सपने लेकर आयी होगी, फोन पर अपने बास का निर्देश ले रही थी- मजा नहीं आ रहा. बात को समझो मैं क्या कहना चाह रहा हूं. लोगों को इसमें दिलचस्पी नहीं है कि सैकड़ों लोग मर गये हैं. उनको कुछ ऐसा दिखाओ कि वे देखते ही रहें. ह्यूमन एंगल ढूंढो. समझ रही हो न! कुछ रोते हुए लोगों को दिखाओ, जिनका पूरा परिवार साफ हो गया हो, वे रो भी  न पा रहें हों, उनके वर्जन लो, उनसे बात करो कि अब वे क्या करेंगे? कुछ इमोशंस डालो, स्टोरी हिट हो सकती है. फोन कट गया और लड़की ने साथ के कैमरामैन की ओर देखकर गाली दी- ब्लडी बास्टर्ड...साला...कुत्ता...सुबह से नचा रहा है...हरामी. कैमरामैन लड़की के कंधे पर एक धौल जमाकर जोर से हंसा-नाचो..नाचो...झल्लाती क्यों हो? इसी बात का तो पैसा मिलता है. चलो एक और  कोशिश करते हैं. उसने चारों ओर निगाह डाली तो सिहर उठा.

 एक दिन पहले दिल्ली में एक बहुमंजिला इमारत गिर गयी थी और उसमें सैकड़ों लोग दब गये थे. पुलिस ने मलबे से लाशें चुन-चुन कर अस्पतालों में ढेर लगा दिया था. अस्पताल की दीवारों पर चीथड़ों मे बदल चुके चेहरों की तस्वीरें चस्पा थीं ताकि लोग अपने अपने खोये हुए परिजनों को पहचान सकें. लोगों की भीड़  रो-रोकर अपने अपने किसी खो चुके प्रियजन को ढूंढने की कोशिश कर रही थी. इनमें ज्यादातर ऐसे थे जो अपना पूरा परिवार खो चुके थे. दर्जनों की संख्या में पत्रकार उनको घेरे हुए थे और उनसे पूछ रहे थे कि उन्हें कैसा लग रहा है? या वे कैसा महसूस कर रहे हैं? लोग झल्लाकर हट जाते, तो कैमरामैन उनका पीछा करते और चेहरे के हावभाव पकड़ने की कोशिश में उनके मुंह तक कैमरा लगा देते. यह लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम पर चल रहे दिल्ली के एक बड़े अस्पताल का नजारा था. 

वह पत्रकारनुमा लड़का भी इसी काम के लिए आया था. अब चूंकि वह खबरिया चैनल की जगह अखबार में नौकरी बजाता है तो उस पर दबाव था कि वह उन चीजों को शब्दों में ढाले. उसने पुलिस और घटनास्थल पर इकट्टा कुछ लोगों से बातचीत की. मरने वालों में ज्यादातर बिहार और बंगाल से आये मजदूर थे. प्याज के दाम बढ़ जाने मात्र से जहां सरकारें बनती बिगड़ती हैं, वहां सैकड़ों मजदूरों के मरने पर बस इतना हुआ कि उनकी मौत की कीमत लगा दी गयी- हर मरने वाले को एक लाख और घायल को पचास हजार का मुआवजा दिया जायेगा. उसने दफ्तर आकर रिपोर्ट बनायी कि ’भूख के बोझ तले दबे सैकड़ों सपने’. 

संपादक महोदय ने देखा और चिल्ला पड़े. यह तुम क्या कर रहे हो? मुझे यह नहीं चाहिए. कौन मरा, क्यों मरा, क्या वजह है, कौन जिम्मेदार है, इसमे किसकी दिलचस्पी है? भाषण नहीं चाहिए. थोड़ी इमोशंस डालो..ह्यूमन एंगल. डिटेलिंग करो. दिलचस्प स्टोरी बनाओ ताकि लोग पढ़ें. जाओ फिर से जाओ. वह फिर से गया और शाम को आकर एक फीचर लिखा. वह लोगों की मौत का उत्सव था. इस उत्सव पर संपादक खूब खुश हुआ. हां, बस यही तो चाहता था मैं. अब तुम थोड़ा-थोड़ा लाइन पकड़ने लगे हो. 

वह रोज दफ्तर से घर लौटता और रात र परेशान रहता कि आने वाले दिन कितने मुश्किल हैं? वह उन सब बातों को कह नहीं सकता जो उसे लगता है कहनी ही चाहिए और इस बात से उसे इतनी बेचैनी होती है कि वह रो पड़ता है और सोचता है कि उसे कोई नौकरी नहीं करनी चाहिए. नौकरी करता हुआ आदमी पालतू कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं है. नौकरी गुलामी सरीखी है. वहां आप कोल्हू के बैल हैं. आपको हांकने वाले सिर्फ कोल्हू के इर्द-गिर्द आपका घूमना पसंद करते हैं. 

आटो चल रहा था और लड़का सोच रहा था कि हो सकता है कि आफिस पहुंच कर उसे ओबामा चालीसा लिखने को कहा जाय. उसे चलते हुए आटो की सरसराहट में अमेरिका राग सुनाई पड़ रहा है. यह उसे बिल्कुल आश्चर्यजनक नहीं लग रहा, क्योंकि यह समय ही ओबामा-अमेरिकामय हो गया है. दिल्ली के गलियारे गलियारे में ओबामा चर्चा जारी है. मीडिया में ओबामा सबसे खूबसूरत नारा है. सुबह उठकर आप सबसे ज्यादा बातें ओबामा के बारे में सुन-देख और पढ़ सकते हैं. उसके दफ्तर में भी कल की मीटिंग में यह तय हो चुका है कि अब अगले एक हफ्ते तक ओबामा के सिवा कुछ नहीं छपेगा. उसने एक पत्रिका निकाली लेकिन उसे पढ़ा नहीं, क्योंकि उसमें कुछ कविताएं लिखीं थीं जो उसे काफी विचलित कर सकती थीं. न चाहते हुए भी  कविता की पंक्तियां दिमाग में घूम गयीं- वे कहते हैं आजाद हूं मैं/ मैं कहता हूं कि घुटता हूं/ बंधा-बंधा जंजीरों में/बस एक कामना मुक्ति की/ सांसों की गिरहें खुल जायें/ फिर जियें अन्यथा मर जायें....

उसके झोले में अखबारों की दो-एक कतरन थी जिसे उसने निकाल कर फेंकना चाहा, लेकिन जाने क्या सोचकर वापस झोले में रख लिया. इनमें से एक कतरन देश र के उन बच्चों के बारे में थी जिन्हें रविवार की छुठ्टी अच्छी नहीं लगती क्योंकि उस दिन उन्हें खाना नहीं मिलता. पढ़ने की जगह से उनका रिश्ता सिर्फ रोटी का रिश्ता है. यह कटिंग उसने कल अपने बाॅस को दिखायी थी और उन्होंने कंधा उचका कर कहा- अरे...छोड़ो, यह सब, कौन पढ़ता है इसे.... 

वह दफ्तर पहुंचा तो मीटिंग चल रही थी और योजना बन रही थी कि कैसे-कैसे क्या-क्या देना है कि पाठक पढ़कर अभिभूत हो उठें. वह भी  शामिल हो गया. अगले दिन बराक ओबामा को भारत में आना था. हां, अमेरिका का राष्ट्रपति बराक ओबामा. मीटिंग में तय पाया गया कि सब अलग-अलग बातों पर निगाह रखेंगे. ओबामा की गाड़ी, ओबामा का होटल, ओबामा का भोजन, पहनावा, चाल-ढाल, उनकी पत्नी, उनका जीवन, उनकी उपलब्धि, वे कैसे शीर्ष तक पहुंचे. उससे कहा गया कि वह लिखेगा कि ओबामा भारतीय युवाओं में क्यों एक आदर्शपुरुष की तरह लोकप्रिय हैं. वह बहुत देर तक बैठा सोचता रहा. उसका सर चकरा रहा था. वह वहां से उठकर भाग जाना चाहता था. सांसें भारी थीं. उसे लगता था कि वह कहीं अंधेरी कोठरी में कई सदियों से बंद है जहां कभी  हवा नहीं जाती. उसकी आंखों के आगे धुंध सी छा गयी थी. सामने कंप्यूटर की स्क्रीन धुंधली सी दिख रही थी. उसके वालपेपर पर एक सूरजमुखी का फूल था जो आज उसे काला दिख रहा था. थोड़ी देर बाद घूमते हुए बास उधर आया. पूछा- क्यों जी सर लटका के क्यों बैठे हो? उसने कहा- सर चक्कर आ रहा है. मैं काम नहीं कर सकता. उन्होंने पूछा-क्या हुआ? 
- सर, पता नहीं... 
उन्होंने कहा-ठीक है थोड़ा रिलैक्स हो लो. 
- जी मैं बैठ नहीं पाउंगा. जाना चाहता हूं. 
- अरे यार अगला एक हफ्ता कितना जरूरी है? अंदाजा है तुमको? चलो कोशिश करो. 
वह थोड़ी देर और बैठा रहा फिर बोला- सर मैं जा रहा हूं. 
वह चला गया. घर पहुंच कर शाम को उसने फोन किया सर टाइफाइड हो गया है. बेड रेस्ट लेना होगा. 
अगले एक हफ्ते तक वह घर में रहा और रोज सुबह अखबारों में पढ़ता रहा- भारत कल की महाशक्ति... ओबामा ने माना भारत को महाशक्ति...भारत बना सुपर पावर... उस दौरान विदर् के बारे में कोई खबर नहीं छप रही थी. इस एक हफ्ते दिल्ली के अखबारों में रोज छपने वाली बलात्कार की खबरें भी नदारद थीं. उसने अपनी छुट्टी एक हफ्ते और बढ़वा ली. उसे लग रहा है कि उसके हाथ-पांव जंजीरों में जकड़े हुए हैं. 

वह अब नौकरी के बारे में नहीं सोचता. अब वह हरदम अपनी आजादी के बारे में ज्यादा सोचता है और हर सुबह उठकर अखबारों में खोजता है कि आजादी की आकांक्षा रखने किन किन लोगों को सजा सुनायी गयी है.

Monday, April 2, 2012

काकी

काकी कहा करती थीं कि लोग मर जाते हैं लेकिन वास्तव में वे मरते नहीं हैं। बस चोला बदल जाता है। तुम्हारे काका भी मरे नहीं हैं। यहां उनका समय पूरा हो गया था, दाना पानी उठ गया था, इसलिए चले गये। हमें भी साथ ही जाना था, लेकिन हमारा टिकट कहीं खो गया है। दूत लोग ढूंढ रहे होंगे। मिलेगा तैसे ही हमें भी जाना है। ये हां इंतजार कर रहे होंगे। तुम्हारे काका हमसे कहे थे कि हम चल रहे हैं तुम आना।
काकी की इस तरह की बातें सुन-सुन कर बच्चे हंसते और सयाने हैरान होते और काकी हरदम अजीब भाव में रहतीं।
काका के जाने के बाद काकी ऐसे हो गयीं जसे जलते दिये का तेल खतम हो गया हो और अब बुझना ही चाह रहा हो। जो काकी थकती नहीं थीं, अब थकान कभी उतरती नहीं। जिस घर में कभी उदासी नहीं फटकती थी, ह घर जसे उदासी का स्थाई बसेरा हो गया। एक खंडहर, जिसमें काकी किसी आत्मा की तरह भटकने लगीं।
काका की मृत्यु आकस्मिक नहीं थी, कई महीनों से वे बीमार थे। काका चारपाई पर लेटे रहते और काकी उनके आगे-पीछे मंडराती रहतीं। खाना, पानी, दवा वगैरह पूछती रहतीं। कभी सिरहाने बैठकर सर पे हाथ फिरातीं, तो कभी पैताने बैठकर पांव दबातीं। काका ने पूरे जीन काकी से कभी पांव नहीं दबाया था। काकी जब कभी पांव दबाने लगतीं, तो वे इशारे में मना करते। काकी कहतीं-अरे जवानी की बात और थी। तब हाथ-पांव काम करता था। देह में जान थी। नहीं दबावाया, न सही। अब तो जो करूं, करने दो। इतने से क्या जाता है तुम्हारा। जानती हूं कि समय आएगा तो कोई रोक नहीं पाएगा, बस मुझे थोड़ा संतोष हो जाता है। नहीं ले जा सकती तुम्हें बड़-बड़े अस्पतालों में, कोई बात नहीं। जो कर सकती हूं, उसके लिए तो न रोको।
काका चुपचाप पड़े-पड़े उन्हें देखते रहते। जब वे किसी काम से वहां से खिसकतीं तो चुपचाप आंखों के कोर भिगोते और गमछे से सुखा लेते। काका को जैसे अंदेशा हो गया था कि अब वे जहाने-फानी से कूच करने वाले हैं।
पूरे गांव में यह जोड़ी अनोखी थी। उनके जीने का सलीका एकदम अलग था। उनके पास कुछ नहीं था लेकिन वे प्रेम से भरे थे और इसलिए शायद उनके पास सबकुछ था। 
वे दोनों के जवानी के दिन थे जब अचानक एक जगह वे मिल गए थे। उन्होंने पाया कि उन दोनों की दुनिया बिल्कुल एक जैसी है। दोनों अलग-थलग। दोनों बेसहारा। दोनों उदास। दोनों प्यासे। उन्होंने एक-दूसरे की ज़रूरतों को पहचान लिया। एक-दूसरे को संबल दिया और साथ-साथ चल पड़े।
लेकिन अब जब काकी अकेली रह गयीं, तो जीना मुश्किल लगने लगा। अब उनके पास काका के साथ जी गई जिंदगी के स्याह-सफेद निशानों के अलावा काका की छोड़ी हुई कुछ संपत्ति रह गयी- मसलन, एक कमरे का मिट्टी का घर, उसमें एक कोने में लगा हुआ काका का पुराना बिस्तर, एक जोड़ी हुक्का, एक पीतल का लोटा, घरेलू उपयोग की कुछ छोटी-मोटी स्तुएं और एक गाय बछड़ा। ये सारी चीजें काकी की जान से बढ़ कर थीं। वे अपने बचे जीवन के बजाय इन सामानों की ज्यादा चिंता करतीं। इस्तेमाल करें न करें, लोटे को दिन में कई बार धुलतीं। एक दिन लोटा मांजते हुए उसकी पेंदी में जरा सा छेद हो गया। काकी की आंखें भर आयीं। काका को जैसे सुनाते हुए बोलीं- खुद तो चले गये, यही सब टीन-टांगड़ी बचा है, उसको भी किसी की नजर लग गयी है। सब से हाथ धोना पड़ेगा? बुदबुदाते हुए उन्होंने काका का बिस्तर ठीक किया और जाकर चौखट पे बैठ गयीं।
काकी हरदम इस तरह का व्यहार करतीं, जैसे कि काका जीवित हैं और वहीं आसपास हैं। जो कह रही हैं, सब सुन रहे हैं। वे रोज ही उनका बिस्तर ठीक करतीं, लोटा धुलती थीं। उन्हें सुनाकर बड़बड़ातीं। सब कहते कि  कि काकी पागल हो गयी हैं। 
तीस साल की उम्र तक काका की शादी नहीं हुई थी। घर में दूसरा कोई नहीं था। काका की बेतरतीब जिंदगी अपने ढंग से चल रही थी कि उन्हें काकी मिल गयीं। काका ने काकी से व्याह कर लिया। लेकिन मुश्किल यह हुई कि काका अपनी जाति से ब्राह्मण थे और काकी अपनी पैदाइश के कारण ब्राह्मण समाज के लिए वर्ज्य। समाज ने उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया। किसी के यहां आना-जाना खाना-पीना सब बंद।
अब उनकी दुनिया एक कच्चे घर में सिमट गयी, जहां सिर्फ ही दोनों थे। लेकिन अपने में मगन। लोगों के बहिष्कार का उन पर कोई असर नहीं हुआ। काका कहते- लोग मेरे यहां आते जाते थे तो क्या, मेरी परेशानी तो किसी ने कम नहीं कर दी। मेरा घर नहीं बसेगा तो जमाना मेरे काम आएगा क्या? उन्होंने जमाने की फिक्र करनी बंद कर दी।
कोई आमदनी न होने से अक्सर अभाग्रस्तता रहती थी। खेती बस इतनी थी कि थोड़ा-बहुत गेहूं या धान उगा लेते थे। गंवई जीवन में पेट पालने का जो सबसे अच्छा जुगाड हो सकता था, वही काका ने भी कर लिया था। उन्होंने बंटाई पर एक गाय ले ली। बंटाई की शर्त थी कि काका गाय को खिलाएंगे। आधा दूध गाय मालिक का। आधा का का। गाय जो बच्चे देगी, वे काका को ही मिलेंगे।
इस तरह कुछ एक सालों में काका का घर जानरों से भर गया। अब एक न एक गाय हमेशा दूध देती रहती थी। बहुत बार जब घर में अनाज नहीं होता तो दूध-दही के सहारे ही दिन कट जाते। कभी-कभी थोड़े में ही काम चला लिया जाता  और दूध बेंच कर कुछ पैसे मिल जाते, जिससे दूसरी जरूरतें पूरी हो जातीं।
काका अपने जानरों को बहुत प्यार करते। वे पैदा होते ही हर एक का नामकरण कर देते। जो मंगलार को पैदा हुआ, उसका नाम मंगरू। जो शुक्रावार को पैदा हुआ, उसका नाम सुकई। किसी का गुड्डू तो किसी का नाम बिड्डू। वे उन्हें बच्चों की तरह पालते। उनके और जानरों के बीच जो समझ थी, वह लोगों के बीच क्या होगी? काका उन्हें जो निर्देश देते, वे उसका अनुसरण करते। कोई जानवर किसी तरफ जा रहा हो और काका उसको पुकारते तो वह लौट पड़ता। गायें उन्हें देखते ही चिल्लाने लगतीं, मगर जसे वे चुप रहने को कहते, वे चुप हो जातीं। वे चारा लेकर आते तो गायें खाने को लपकतीं। काका कहते- रुको अभी और गायें झट से सावधान  मुद्रा में खड़ी हो जातीं। गायों से काका की बातचीत देखकर लोग दंग रह जाते। काका कहते थे कि वे  अपनी गायों की भाषा समझते हैं। वे खूंटे से बंधी छटपटा रही होतीं और काका पहुंच कर उनकी गर्दन से अपनी गर्दन लगाकर उन्हें पुचकार देते तो वे मान जातीं। कुछ लोग कहते कि काका के बाल-बच्चे नहीं हैं इसलिए वे जानरों को बच्चों की तरह प्यार करते हैं। इस पर काका बछड़े को दुलारते हुए कहते- किस बच्चे से कम है यह मेरा प्यारा-सा गुड्डू।
काकी कहतीं- उन्हें बच्चे इसलिए नहीं हुए कि अभी काका के साथ कई जनम बाकी है। हम दोनों दोबारा जनम लेंगे, तब बच्चे भी होंगे।
ऐसा था काका-काकी का सपनीला सा संसार। काका के जाने बाद काकी कई दिनों तक तो बिल्कुल खामोश रहीं। कोई कुछ पूछता तो जवाब नहीं देतीं। बस चुपचाप देखती रहतीं। लोग डर जाते। अपने को सम्हालने की उन्होंने हर संभव कोशिश की, लेकिन एक तो काका की कमी, ऊपर से बुढ़ापा। काकी अपने को हर मोड़ पर कमजोर पाती गयीं। उनकी जिंदगी धीरे-धीरे अपने हाथ-पांव समेटने लगी। उन्होंने सोचा कि खेती खुद सम्हालें, मगर उनसे नहीं हो सका तो अगले सीजन खेत बंटाई पर उठा दिया। हालांकि, काका के रहते खेती का भी ज्यादातर काम वे खुद करती थीं। 
अब उनके जिम्मे सबसे बड़ा काम रह गया- गाय-बछड़े की परवरिश करना। यह काम उनकी क्षमता से बड़ा था। लोगों ने जानवरों को बेचने की सलाह दी, इस पर काकी ने कहा कि हमारे बुरे दिनों पर ये जानवर ही तो थे, जिन्होंने हमें भूखों नहीं मरने दिया। जब तक देह में जान है, इनकी परवरिश करेंगे। 
वे सारा दिन गाय-बछड़े के लिए चारे के इंतजाम में लगी रहतीं। घास का बोझ लेकर चल नहीं पातीं थीं, इसलिए थोड़ी-थोड़ी घास कांख में दबाकर सारा दिन ढोतीं रहतीं। लोग उन्हें झिड़कते- क्या मर रही हो बुढ़ापे में? गाय किसी और को सौंप दो, पर वे अपनी जिद पर थीं। कहतीं- दूध मिले न मिले, गौ सेवा से परलोक भी तो सुधर रहा है।
वैसे गाय तो काकी की तरह ढलती उम्र में थी इसलिए शांत थी, मगर बछड़ा उन्हें काफी तंग करता था। काकी लेकर चलतीं उसे बांधने के लिए तो वह खींच कर भाग जाता और गांव भर में दौड़ाता रहता। आगे-आगे चौकड़ी भरता हुआ बछड़ा और पीछे-पीछे झुकी कमर पर लुढ़कती हुई काकी। वह जाकर किसी के खेत में खाने लगता तो काकी को भला-बुरा भी सुनना पड़ता। आखिरकार यह मुसीबत तभी टलती, जब कोई उसे पकड़कर काकी के दराजे पर बांध जाता। काकी को इसके बहुत बार भला-बुरा सुनना भी पड़ता।
जब घास ला पाना संभव नहीं हो पाता, तो गाय-बछड़े दोनों बाग में ले जाकर लंबी रस्सी में बांध दिया करतीं और दोनों घास चर के अपना पेट भर लिया करते। एक रोज काकी बछड़े को बांधने जा रही थीं कि वह खींच कर भागा और काकी रस्सी में फंस कर कुछ दूर तक घिसट गयीं। घुटना छिल गया। कई रोज तक मरहम-पट्टी करती रहीं।
आखिरकार काकी ने सोचा कि इसे किसी न किसी को दे देना चाहिए। वे चाहती थीं कि बछड़े को गांव का ही कोई आदमी ले ले, ताकि यह मेरे आंख के सामने रहे। लेकिन गांव में कोई उसे लेने को तैयार न हुआ। अब ज्यादातर लोग बैल से हल नहीं चलाते सो कोई लेकर करे भी क्या? एक कसाई अलबत्ता एक रोज आ धमका, लेकिन काकी ने उसे खदेड़ दिया। बोलीं- यह तो मेरे जीते जी नहीं होगा। हम इसे कसाई को तो नहीं देंगे चाहे घसीट कर मार ही डाले मुझे। वे कहतीं- अगर इसे सही ठिकाने न भेजा तो काका की आत्मा दुखी होगी। मगर जब कोई उसे लेने को तैयार न हुआ तो हार कर उन्होंने उसे पशु बाजार में बेचने का फैसला किया।
पशु बाजार गांव से करीब आठ किमी दूर था। काकी बछड़े को लेकर चल पड़ीं। सड़क पर पहुंचते ही बछड़े को ट्रक दिखा और वह डर कर भागा। काकी ने उसका पगहा हाथ में लपेट रखा था। वे बछड़े के पीछे दूर तक घिसटती गयीं। जब तक हाथ से पगहा छूटता, काकी काफी चोट खा गयीं। बछड़ा भागते-भागते काफी दूर निकल गया और ओझल हो गया। काफी खोजबीन के बाद बहुत दूर जाकर किसी के खेत में खाते हुए दिखा। काकी ने कुछ लड़कों की मदद से उसे पकड़ा। लेकिन वह फिर खींच कर भाग गया। आखिरकार गांव के कुछ नौजान और रास्ते में मिल गये जो अपने-अपने बैल-बछड़े बेचने ले जा रहे थे। उन्हीं में से एक ने अपना बूढ़ा बैल काकी को पकड़ाया और बछड़े को अपनी हिरासत में लिया।
बाजार पहुंच कर सबने अपने अपने जानरों को पेड़ की जड़ों में बांध दिया। काकी भी अपने बछड़े को एक जगह बांध कर बैठ गयीं। वे बहुत थक गयीं थीं। पोर-पोर दुखने लगा था। उन्हें काका की याद आ गयी- अगर वे होते तो यह मुसीबत मेरे सर क्यों आती? ये जानवर उनके पाले हुए न होते तो हम अपनी जान इनमें क्यों फंसाये रखते? चलो आज आखिरकार छुटकारा मिल जायेगी। औने-पौने गाय भी बेच देंगे, बस फुर्सत।


काकी बड़बड़ा रही थीं, तभी किसी ने पूछा- अरे माई, अकेले किससे बतिया रही हैं? ये बछड़ा आप ही का है न? कितने में बैठेगा? दूसरे ने कहा- अरे बैठना क्या है पहले देखो तो सही, किसी काम हो तब न! तीसरे ने कहा- यह टिड्डा तो किसी काम का नहीं है। क्या करेंगे इसे लेकर? काकी बोलीं-भैया जो मन आये दे दो और ले जाओ। कुछ देर आगे पीछे से बछड़े का निरीक्षण करने के बाद तीनों ने मिलकर 20 कज निकाला और चलते बने। इसी तरह दिन भर लोग आते रहे, साल पर साल पूछते रहे। पर ले कोई नहीं गया।
शाम होने को हो आयी। लोग अपने घर लौटने लगे। जिनके जानवर बिक गये थे और मन मुताबिक दाम मिल गया, वे खुश थे। जिनका सौदा थोड़ा घाटे में गया वे थोड़ा मायूस थे। जिनके नहीं बिके वे निराश होकर लौटने की तैयारी करने लगे। काकी कह रही थीं कि इसे यहीं छोड़ जाती लेकिन जाने कौन ले जाये, क्या करे? कुछ समझ में नहीं आता क्या करूं? बछड़े को लेकरोपस लौटना भी उनका जी लरज रहा था।
साथ आये लोगों में भी किसी का कुछ नहीं बिका। जो लड़का काकी का बछड़ा लाया था उसके बैल भी नहीं बिके थे। उसने काकी से कहा- काकी, आप मेरे बैल ले चलिए, मैं आपका बछड़ा ले चलता हूं। लौटने की पूरी तैयारी हो गयी थी कि दो आदमी टहलते हुए उधर आये। एक ने काकी से पूछा- बछड़ा आपका है? कितने में पड़ेगा? काकी ने वही वाक्य दोहरा दिया जो सुबह से दोहरा रही थीं- जो देना हो भैया दे दो, ले जाओ। उसने खीस निपोरते हुए पूछा- पक्का जो देना हो दे दें?
काकी बोलीं- दे दो भैया जो देना हो दे दो, न देना हो कुछ न दो मुला इसे ले जाओ। उसने अपनी जेब में हाथ डाला और कुछ सिक्के निकालकर काकी की ओर बढ़ाते हुए बोला- लो इतना ही है, रख लो और दे दो। काकी ने अपनी कांपती हथेली उसकी ओर बढ़ा दी और उसने सिक्के काकी के हाथ पर रख दिये। काकी ने पूछा- कितने हैं? उसने कहा- गिन लो। काकी ने कहा- क्या गिनें? सोलह-बीस आने जो भी होंगे ठीक है, बस इसे ले जाओ। पर हां, एक काम करना कि इसे कसाई को मत देना। वह आंख चमकाते हुए बोला- अरे माई! क्या बात करती हैं? पाप करूं तो नरक में भी जगह न मिले। काकी ने पैसे कमीज की जेब में डाल लिये। उसने कहा- अरे  माई गिन तो लो। काकी ने कहा- जाओ ले जाओ। ले जाओ इसे। जितना होगा सब ठीक है। उन्होंने बछड़े का पगहा खोलकर उन्हें पकड़ा दिया। वे लोग लेकर चल दिये। वे लोग चलने लगे तो बछड़ा पलट कर काकी की ओर भागा। लेकिन लगाम ने उसका मुंह फिर अपनी ओर खींच लिया। काकी के चेहरे की शिकन और उभर आयी। वे बछड़े को जाते देखती रहीं और आंचल से अपनी आंखें पोंछती रहीं। बछड़ा बार-बार पलट कर पीछे देखता रहा। पास खड़े लड़के ने पूछा- काकी तुम्हारी अकल मारी गयी है क्या? क्यों दे दिया ऐसे? अरे गिनो तो, वे पैसे ज्यादा नहीं हैं। तुम्हें ठग ले गये वे लोग। दस पांच रुपये होंगे। काकी बोलीं- उस बछड़े का कोई मोल नहीं है बाबू! उसे ले जाने दो। उसका दाम मांगूगी तो इस दुनिया में कोई नहीं दे पाएगा। इतना कह कर काकी उठीं और घर की ओर चल दीं। वे बदहासी में चली जा रहीं थी। रास्ते में कहीं रुकी भी नहीं।
वे घर पहुंची तो रात के दस बज चुके थे। वे चूर हो चुकी थीं। दिन भर की भूख थकान की आग में घी का काम कर रही थी। उन्होंने लोटा भर कर पानी पिया और जाकर बिस्तर पर लुढ़क गयीं।
वे सो कर उठीं तो सुबह के आठ बज रहे थे। बीता हुआ दिन उनकी आंखों में तैर गया। धीरे से उन्होंने जेब में हाथ डाला और सिक्के निकाल कर गिने- साढ़े सोलह रुपये थे। काकी ने उन पैसों को एक पुराने कपड़े में बांधा और काका के बिस्तर के नीचे सिरहाने की ओर छुपा दिया।
(यह कहानी एक अप्रैल को जनसत्ता में छपी है)