Friday, July 26, 2013

मैं तिनके सा

मैंने कहा- मैं तुम्‍हें प्‍यार करता हूं।
उसने कहा- तुम बुद्धू हो।
मैंने कहा- तुम बहुत सुंदर हो।
उसने कहा- -तुम परिपक्‍व नहीं हो।
मैंने कहा- तुम्‍हारे बिना जी नहीं लगता।
उसने कहा-तुम बच्‍चे हो।
मैंने कहा- जिया नहीं जाता अब।
उसने कहा-तुम अधीर हो।
मैंने कहा- तुम्‍हारे सिवा कुछ अच्‍छा नहीं लगता।
उसने कहा-तुम्‍हारा स्‍वार्थ तुम पर हावी हो रहा है।
मैंने कहा- कुछ समझ नहीं आता।
उसने कहा-तुम्‍हारी आंखें बंद हो चुकी हैं।
मैंने कहा- मैं तिनके सा हूं। अपने पांवों में कहीं जगह दे दो।
उसने अपने पावों के पास देखने की बजाय दूर कहीं शोर सुना। वह आगे बढ़ गई। मैं उसके जूते में फंसकर उड़ा और दो कदम दूर झाडि़यों में फंस गया। 

3 comments:

  1. मार्मिक प्रस्तुति - बहुत खूब

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  2. meri kuch हिंदी कवितायेँ http://aajkhdo.blogspot.in/

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